मंडी। न्याय में देरी को लेकर अक्सर सवाल उठते हैं, लेकिन हिमाचल के मंडी से सामने आया एक मामला पुलिस की कार्यप्रणाली पर ही सवाल खड़े कर रहा है। जिस मामले में कानून के तहत अधिकतम 200 रुपये का जुर्माना हो सकता था, उसकी कार्रवाई अदालत तक पहुंचने में सालों लग गए।

 200 रुपये के लिए 19 साल चला केस

जब मामला कोर्ट के सामने आया तो न्यायालय ने इतनी देरी पर कड़ा रुख अपनाते हुए पुलिस की ओर से पेश चालान को ही खारिज कर दिया और आरोपी को बरी कर दिया। मामला मंडी के बल्ह थाना क्षेत्र से जुड़ा है और करीब 19 साल पुराना है।

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2007 में दर्ज हुआ था मामला

जानकारी के अनुसार, पुलिस ने 4 फरवरी 2007 को अशोक नामक व्यक्ति के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 283 के तहत मामला दर्ज किया था। यह धारा सार्वजनिक रास्ते पर बाधा या लोगों के लिए खतरा पैदा करने से संबंधित है।

दो दशक लगे केस सुलझने में

इस अपराध में अधिकतम सजा के तौर पर सिर्फ 200 रुपये के जुर्माने का प्रावधान था। यानी मामला बेहद मामूली प्रकृति का था। मगर इसकी कानूनी प्रक्रिया इतनी लंबी खिंच गई कि करीब दो दशक बीत गए।

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12 साल से ज्यादा समय बाद अदालत पहुंचा चालान

मामले की सुनवाई के दौरान सामने आया कि पुलिस की ओर से चालान अदालत में पेश करने में 12 वर्ष से भी अधिक की देरी हुई। इस दौरान फाइल अलग-अलग स्तरों पर घूमती रही।

क्यों इतना लंबा चला केस?

बताया गया कि मामले से संबंधित कार्रवाई ग्राम पंचायत, नगर परिषद नेरचौक और पुलिस थाने के बीच पत्राचार और प्रशासनिक प्रक्रिया में उलझी रही। नतीजा यह हुआ कि जिस मामले को जल्द निपटाया जा सकता था, वह वर्षों तक लंबित पड़ा रहा। सबसे अहम बात यह रही कि इतनी लंबी देरी के बावजूद पुलिस ने अदालत से देरी को माफ करने के लिए आवश्यक कानूनी प्रक्रिया भी नहीं अपनाई।

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छह महीने की समयसीमा का भी ध्यान नहीं रखा

न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी, कोर्ट नंबर-3 मंडी की अदालत ने मामले पर सुनवाई करते हुए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 468 का हवाला दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल जुर्माने से दंडनीय अपराधों में अदालत के संज्ञान लेने की समयसीमा छह महीने है।

पुलिस ने अदालत में कुछ नहीं रखा...

ऐसे में 2007 में दर्ज हुए मामले का इतने वर्षों बाद अदालत में पहुंचना कानून में निर्धारित समयसीमा से काफी बाहर था। देरी को माफ कराने के लिए पुलिस की ओर से कोई ठोस आधार या उचित आवेदन भी अदालत के सामने नहीं रखा गया।

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कोर्ट ने कहा- अब ट्रायल चलाना भी उचित नहीं

अदालत ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए पुलिस के चालान को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने माना कि इतने पुराने और मामूली प्रकृति के मामले को अब आगे बढ़ाकर ट्रायल चलाना व्यावहारिक नहीं होगा।

19 साल तक मानसिक परेशानी

न्यायालय के अनुसार, करीब 19 साल पुराने ऐसे मामले की सुनवाई जारी रखना आरोपी के लिए अनावश्यक मानसिक परेशानी का कारण बन सकता है। इसके साथ ही अदालत का बहुमूल्य समय और संसाधन भी ऐसे मामले में खर्च होंगे, जिसका अपराध केवल जुर्माने से दंडनीय था। इसके बाद कोर्ट ने चालान खारिज करते हुए आरोपी अशोक को बरी कर दिया और संबंधित फाइल को रिकॉर्ड रूम भेजने के निर्देश दिए।

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ऐसे चार और मामलों में भी चालान खारिज

यह अकेला मामला नहीं है। अदालत के सामने इसी तरह की देरी से जुड़े चार अन्य मामलों में भी पुलिस की ओर से पेश किए गए चालान खारिज किए जा चुके हैं।

इन मामलों ने पुलिस की जांच और चालान पेश करने की प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं। खासकर तब, जब मामूली मामलों में भी कार्रवाई समय पर पूरी नहीं हो पाती और फाइलें वर्षों तक अलग-अलग कार्यालयों के बीच घूमती रहती हैं।

19 साल पुराना केस, लेकिन सवाल आज का

मंडी का यह मामला सिर्फ एक आरोपी के बरी होने तक सीमित नहीं है। यह सवाल भी खड़ा करता है कि आखिर एक मामूली अपराध की फाइल को अदालत तक पहुंचने में इतने साल क्यों लगे?

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उठ रहे कई गंभीर सवाल

अगर कानून ऐसे मामले में छह महीने के भीतर अदालत के संज्ञान लेने की सीमा तय करता है- तो फिर 12 साल से ज्यादा की देरी के बाद चालान पेश करने की जरूरत क्यों पड़ी? और उससे भी बड़ा सवाल यह है कि इस देरी की जिम्मेदारी आखिर किसकी थी? फिलहाल अदालत के आदेश के बाद अशोक के खिलाफ इस मामले की कार्यवाही खत्म हो गई है और फाइल रिकॉर्ड रूम भेजने के निर्देश दिए गए हैं।

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