शिमला। सरकारी योजनाएं तब ही जमीन पर असर दिखाती हैं, जब उन्हें पारदर्शी तरीके से और समय पर जनता के लिए लागू किया जाए। खासकर स्वास्थ्य जैसी संवेदनशील सेवा में अगर आर्थिक प्रवाह रुक जाए, तो उसका असर सीधे मरीजों और उपचार व्यवस्था पर पड़ता है।

हिमाचल सरकार को लगी फटकार

हिमाचल प्रदेश में आयुष्मान भारत और हिमकेयर योजना के अंतर्गत पंजीकृत निजी अस्पतालों के लंबित भुगतान का मामला अब न्यायालय की चौखट तक पहुंच चुका है, जिस पर उच्च न्यायालय ने गंभीर टिप्पणी की है।

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हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अगर कैशलेस उपचार देने वाले अस्पतालों को समय पर पेमेंट नहीं दी जाती- तो ऐसी जनकल्याणकारी योजनाओं का मूल उद्देश्य ही प्रभावित हो जाएगा। यह टिप्पणी जस्टिस ज्योत्स्ना रेवाल दुआ की एकल पीठ ने एमएस मात्री मेडिसिटी एंड ऑर्थोकेयर हॉस्पिटल बनाम राज्य हिमाचल प्रदेश व अन्य मामले की सुनवाई के दौरान की।

आयुष्मान-हिमकेयर भुगतान में देरी

याचिकाकर्ता अस्पताल की ओर से अदालत को बताया गया कि उसने आयुष्मान भारत योजना और हिमकेयर योजना के तहत पात्र लाभार्थियों का उपचार स्वीकृत पैकेज दरों पर किया। अस्पताल ने दावा किया कि सभी आवश्यक औपचारिकताएं पूरी की गईं, निर्धारित पोर्टल पर बिल अपलोड किए गए और दिशा-निर्देशों का पालन किया गया, इसके बावजूद भुगतान लंबित है।

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वित्तीय दबाव का हवाला

अस्पताल प्रबंधन ने अदालत में दलील दी कि भुगतान में लगातार हो रही देरी से आर्थिक दबाव बढ़ रहा है। निजी अस्पतालों को डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ, दवाओं और उपकरणों पर नियमित खर्च करना होता है। यदि समय पर राशि प्राप्त न हो, तो सेवाओं की निरंतरता प्रभावित हो सकती है।

 

अदालत ने इस पहलू को गंभीरता से लेते हुए कहा कि जिन अस्पतालों ने सरकारी योजनाओं के तहत मरीजों को बिना अग्रिम भुगतान के इलाज दिया है, उन्हें लंबित भुगतान के लिए प्रतीक्षा में रखना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।

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कैशलेस व्यवस्था पर संकट की आशंका

कोर्ट ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि आयुष्मान भारत और हिमकेयर जैसी योजनाएं आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को राहत देने के उद्देश्य से लागू की गई हैं। इनका आधार ही “कैशलेस उपचार” की व्यवस्था है। अगर अस्पतालों को समय पर भुगतान न मिले, तो वे इन योजनाओं के तहत मरीजों का उपचार करने में संकोच कर सकते हैं।

 

अदालत ने यह भी कहा कि प्रशासनिक विलंब, तकनीकी खामियां या प्रक्रियात्मक देरी भुगतान रोकने का स्थायी आधार नहीं बन सकतीं। योजनाओं के प्रभावी संचालन के लिए वित्तीय अनुशासन अनिवार्य है।

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सरकार को निर्देश

एकल पीठ ने केंद्र और राज्य सरकार के साथ-साथ संबंधित क्रियान्वयन एजेंसियों को निर्देश दिए कि याचिकाकर्ता के लंबित बिलों की जांच कर नियमों के अनुरूप देय राशि का समयबद्ध भुगतान सुनिश्चित किया जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि लाभार्थियों को उपचार उपलब्ध कराने वाले अस्पतालों के साथ भुगतान के मामले में उदासीनता नहीं बरती जा सकती।

अन्य अस्पतालों को भी मिल सकती है राहत

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश राज्य के अन्य सूचीबद्ध अस्पतालों के लिए भी राहत का आधार बन सकता है, जो इसी तरह की भुगतान देरी का सामना कर रहे हैं। खासकर हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य में, जहां सरकारी स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित हैं और निजी अस्पतालों की भूमिका महत्वपूर्ण है, वहां योजनाओं की निरंतरता सुनिश्चित करना बेहद आवश्यक है।

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अब आगे क्या होगा?

इन टिप्पणियों और निर्देशों के साथ अदालत ने याचिका का निस्तारण कर दिया। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि संबंधित एजेंसियां अदालत के निर्देशों का पालन कितनी शीघ्रता और गंभीरता से करती हैं।

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