शिमला। हिमाचल प्रदेश के हजारों पौंग बांध विस्थापितों की दशकों पुरानी लड़ाई एक बार फिर न्यायपालिका के दरवाजे तक पहुंच गई है। वर्षों से पुनर्वास और भूमि आवंटन के लिए संघर्ष कर रहे विस्थापितों को अब हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट से राहत मिलने की उम्मीद जगी है। अदालत ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए राजस्थान के श्रीगंगानगर जिला कलेक्टर को व्यक्तिगत रूप से तलब किया है और पूछा है कि जिन विस्थापितों के लिए भूमि श्रीगंगानगर में आरक्षित की गई थी, उन्हें वहां बसाने के बजाय सैकड़ों किलोमीटर दूर जैसलमेर क्यों भेजा जा रहा है।
आधी सदी बाद भी अधूरा पुनर्वास
पौंग बांध परियोजना के निर्माण के दौरान हिमाचल प्रदेश के हजारों परिवारों को अपना घर, जमीन और पुश्तैनी गांव छोड़ने पड़े थे। इन परिवारों के पुनर्वास के लिए राजस्थान में भूमि देने की योजना बनाई गई थी, ताकि विस्थापित परिवार नई जगह पर अपना जीवन दोबारा शुरू कर सकें। लेकिन समय बीतता गया और पुनर्वास की प्रक्रिया पूरी तरह धरातल पर नहीं उतर पाई। आज स्थिति यह है कि विस्थापन झेलने वाले परिवारों की तीसरी पीढ़ी भी अपने अधिकारों के लिए सरकारी दफ्तरों और अदालतों के चक्कर काटने को मजबूर है।
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श्रीगंगानगर की जगह जैसलमेर भेजे जा रहे विस्थापित
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह तथ्य सामने आया कि जिन लोगों के पुनर्वास के लिए राजस्थान के श्रीगंगानगर क्षेत्र में भूमि आरक्षित की गई थी, उन्हें अब वहां जमीन उपलब्ध कराने के बजाय लगभग 600 किलोमीटर दूर जैसलमेर में भूमि देने का प्रस्ताव किया जा रहा है। हाईकोर्ट ने इस स्थिति पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि आखिर विस्थापितों को निर्धारित क्षेत्र में भूमि देने के बजाय इतनी दूर स्थानांतरित करने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बीसी नेगी की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि यह बेहद चिंताजनक स्थिति है कि विस्थापन झेलने वाले लोगों की तीसरी पीढ़ी भी अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही है। अदालत ने माना कि इतने लंबे समय बाद भी यदि विस्थापितों को उनका वैधानिक अधिकार नहीं मिल पाया है, तो यह गंभीर प्रशासनिक और मानवीय मुद्दा है, जिस पर तत्काल ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है।
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कठिन इलाकों में जमीन देने पर भी उठे सवाल
पिछली सुनवाई में भी अदालत को बताया गया था कि कई पौंग बांध विस्थापितों को राजस्थान के जैसलमेर और बीकानेर जैसे दूरस्थ और कठिन भौगोलिक क्षेत्रों में जमीन आवंटित की जा रही है। ऐसे क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी और कठिन जीवन परिस्थितियों के कारण विस्थापित परिवारों को बसना आसान नहीं है। अदालत ने तब भी टिप्पणी की थी कि यदि पुनर्वास के नाम पर लोगों को ऐसी जगह भेजा जा रहा है जहां सामान्य जीवन जीना ही चुनौती बन जाए, तो संबंधित सरकारों को इस विषय पर गंभीरता से विचार करना होगा।
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हजारों परिवार अब भी इंतजार में
पौंग बांध परियोजना से प्रभावित 16,352 परिवारों के पुनर्वास के लिए राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले में लगभग 2.20 लाख एकड़ भूमि आरक्षित की गई थी। बावजूद इसके, हजारों पात्र परिवार आज भी भूमि आवंटन और पुनर्वास की प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार कर रहे हैं। जानकारी के अनुसार करीब 5,000 पौंग बांध विस्थापित परिवार अब भी अपने अधिकारों और पुनर्वास के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
दोनों राज्यों को मिलकर निकालना होगा समाधान
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट पहले ही हिमाचल प्रदेश और राजस्थान सरकार के मुख्य सचिवों को संयुक्त बैठक कर समाधान तलाशने के निर्देश दे चुका है। अदालत का स्पष्ट मानना है कि दशकों से लंबित इस मानवीय मुद्दे का स्थायी समाधान अब और टाला नहीं जा सकता।
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22 जुलाई को होगी अगली सुनवाई
हाईकोर्ट ने श्रीगंगानगर के जिला कलेक्टर को अगली सुनवाई पर उपस्थित होकर जवाब देने के निर्देश दिए हैं। अब इस मामले की अगली सुनवाई 22 जुलाई को होगी। पौंग बांध विस्थापितों के लिए यह सुनवाई बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। लंबे समय से अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हजारों परिवारों को उम्मीद है कि अदालत के हस्तक्षेप के बाद उनके पुनर्वास और भूमि आवंटन का रास्ता साफ हो सकेगा तथा उन्हें वर्षों से लंबित न्याय मिल पाएगा।
