शिमला। हिमाचल प्रदेश की राजनीति में इन दिनों सत्ता और व्यवस्था से जुड़े सबसे संवेदनशील सवाल खड़े हो गए हैं। राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग में की गई नियुक्ति ने सुक्खू सरकार को अब कटघरे में खड़ा कर दिया है। जिस संस्था को बच्चों के अधिकारों की रक्षा की सबसे बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई है, उसी संस्था में ऐसे नाम की एंट्री हुई है, जिसके खिलाफ हाई कोर्ट में गंभीर आपराधिक मामला लंबित है। और अब इस मामले में सवाल भी उठने शुरु हो गए हैं कि क्या बच्चों के भविष्य की कुर्सियों पर बैठने के लिए अब बेदाग होना जरूरी नहीं रहा?
मोनिता चौहान की नियुक्ति से उठा बवाल
ये पूरा मामला मोनिता चौहान की नियुक्ति से जुड़ा है, जिन्हें हाल ही में राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग का सदस्य बनाया गया है। इस नियुक्ति के बाद सियासी हलकों से लेकर सामाजिक संगठनों तक तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। दरअसल, मोनिता चौहान के खिलाफ हिमाचल हाईकोर्ट में एक आपराधिक अपील लंबित है, जो अब गंभीर बहस का विषय बन चुकी है।
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हाईकोर्ट में दर्ज है अपराधिक मामला
इस विवाद के केंद्र में दो अहम दस्तावेज भी सोशल मीडिया पर तैर रहे हैं। पहला- प्रदेश सरकार की अधिसूचना, जिसमें मोनिता चौहान को बाल आयोग का सदस्य नियुक्त किया गया है। दूसरा- हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का आदेश, जिसमें प्रीति बनाम मोनिता चौहान आपराधिक अपील संख्या 466/2025 लंबित है।
अदालती रिकॉर्ड के अनुसार, इस मामले में हाई कोर्ट ने अपील स्वीकार की है और मोनिता चौहान को 50 हजार रुपये के निजी मुचलके पर राहत दी गई है। साथ ही बिना अनुमति देश छोड़ने पर भी रोक लगाई गई है।
सरकार से पूछ रहे हैं सवाल
इन सब दस्तावेज के वायरल होने के बाद लोग सरकार से सवाल कर रहे हैं कि क्या उन्हें इस केस की कोई जानकारी नहीं हैं और अगर जानकारी थी, तो क्या एक लंबित आपराधिक मामले के बावजूद इतनी संवेदनशील संस्था में नियुक्ति नैतिक रूप से सही है?
वहीं, कुछ सामाजिक संगठनों का कहना है कि जिस व्यक्ति पर गंभीर आरोपों का मामला अदालत में चल रहा है, उसे बच्चों के अधिकारों की रक्षा जैसे पद पर बैठाना संस्था की विश्वसनीयता पर सीधा हमला है।
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राजनीतिक दबाव और सिफारिश से हुई नियुक्ति
सूत्रों के अनुसार, इस नियुक्ति को लेकर सरकार के भीतर भी असहजता है। चर्चा यह भी है कि किस दबाव या सिफारिश के तहत यह नियुक्ति करवाई गई। हालांकि सरकार की ओर से अभी तक इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
सामाजिक संगठनों ने की इस्तीफे की मांग
उधर, विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों ने सरकार से साफ मांग की है कि या तो मोनिता चौहान स्वयं इस्तीफा दें, या सरकार इस पूरे मामले पर सार्वजनिक रूप से जवाब दे। उनका कहना है कि यह केवल एक नियुक्ति का मामला नहीं, बल्कि हिमाचल के बच्चों के भविष्य और संस्थाओं की साख से जुड़ा सवाल है।
