हमीरपुर। हिमाचल प्रदेश सरकार हर साल करोड़ों रुपए खर्च कर सरकारी स्कूलों में बच्चों को मुफ्त शिक्षा, किताबें, यूनिफॉर्म और अन्य सुविधाएं उपलब्ध करवा रही है। लेकिन अब वही छात्र-छात्राएं सरकारी खजाने में योगदान देंगे। मुख्यमंत्री राहत कोष और आपदा प्रबंधन के लिए स्कूली बच्चों से आर्थिक मदद जुटाई जाएगी।
तेजी से वायरल हो रहा पत्र
दरअसल, हमीरपुर जिले में प्रारंभिक शिक्षा उपनिदेशक (डिप्टी डायरेक्टर एलिमेंटरी एजुकेशन) द्वारा जारी एक पत्र में स्कूलों में जादू शो आयोजित करने की अनुमति दी गई है। इस पत्र में स्पष्ट किया गया है कि इन जादू शो से होने वाली आय का 30 प्रतिशत हिस्सा मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा किया जाएगा।
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यह पत्र सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया और लोगों ने इस पर तीखी प्रतिक्रियाएं देना शुरू कर दिया।
कमाई का हिस्सा सरकार को
शिक्षा विभाग की मंजूरी के बाद मंडी जिले के बरोट क्षेत्र के जादूगर बलवीर सिंह हमीरपुर जिले के विभिन्न सरकारी स्कूलों में जादू शो प्रस्तुत करेंगे। इन कार्यक्रमों के दौरान वह बच्चों को जादू की कला के साथ-साथ सामाजिक बुराइयों जैसे अंधविश्वास, जमाखोरी और बालिका शिक्षा के महत्व को लेकर जागरूक करेंगे। हालांकि, इस शो से होने वाली कमाई का एक निश्चित हिस्सा सरकार को देना अनिवार्य होगा।
क्या कहते हैं शिक्षा विभाग के अधिकारी?
इस मामले को लेकर जब प्रारंभिक शिक्षा निदेशक कमल किशोर से बात की गई तो उन्होंने बताया कि जादूगर बलवीर सिंह ने परोपकारी कार्य करने की इच्छा जताई थी, जिसके तहत उन्हें सरकारी स्कूलों में जादू शो करने की अनुमति दी गई।
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उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इन शो से प्राप्त आय का 30 प्रतिशत सरकारी खजाने में जमा किया जाएगा। इसके पीछे उद्देश्य यह है कि शो के माध्यम से बच्चों में सामाजिक जागरूकता भी फैलाई जाए।
बच्चों से धन जुटाने पर उठ रहे सवाल
हिमाचल प्रदेश सरकार सरकारी स्कूलों में बच्चों को मुफ्त शिक्षा प्रदान कर रही है। किताबें, यूनिफॉर्म, बैग, मिड-डे मील सहित अन्य सुविधाओं पर सरकार हर साल करोड़ों रुपए खर्च करती है। बच्चों से किसी भी प्रकार की फीस नहीं ली जाती। ऐसे में अब उन्हीं बच्चों के माध्यम से धन एकत्र करना और उसे सरकारी खजाने में जमा करवाने का यह निर्णय कई सवाल खड़े कर रहा है।
सोशल मीडिया पर तीखी आलोचना
सोशल मीडिया पर इस फैसले की तीखी आलोचना हो रही है। लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि यदि शिक्षा विभाग को राहत कोष के लिए फंड इकट्ठा करना ही था तो इसके लिए और भी विकल्प मौजूद थे। बच्चों की शिक्षा पर पहले ही सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, ऐसे में इस तरह से बच्चों को अप्रत्यक्ष रूप से राजस्व स्रोत बनाना तर्कसंगत नहीं लगता।
क्या बच्चों के लिए सही है यह पहल?
यह पहल एक ओर जहां सामाजिक जागरूकता और मनोरंजन के रूप में अच्छी लग सकती है, वहीं दूसरी ओर इस पर सवाल उठना भी लाजमी है। क्या बच्चों से इस तरह धन जुटाना उचित है? क्या यह बच्चों और उनके अभिभावकों पर वित्तीय दबाव नहीं डालेगा?
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बहरहाल, सरकार और शिक्षा विभाग इस योजना को सही ठहराते हुए इसे परोपकारी कार्य मान रहे हैं, लेकिन जनता की प्रतिक्रिया से साफ है कि इस फैसले को लेकर असंतोष भी कम नहीं है।
