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July 7, 2026

सुक्खू सरकार को HC का आदेश : केंद्र के अधीन चल रही विद्युत परियोजनाओं को जल्द करें टेकओवर

हाईकोर्ट ने प्रक्रिया में तेजी लाने को कहा

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High Court State Government



शिमला। हिमाचल प्रदेश की ऊर्जा संपदा से जुड़ा एक अहम मामला अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। प्रदेश उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि केंद्र सरकार के उपक्रमों के अधीन विकसित हो रही चार प्रमुख जलविद्युत परियोजनाओं को राज्य के नियंत्रण में लेने की प्रक्रिया में तेजी लाई जाए।

अनावश्यक देरी उचित नहीं

दरअसल, अदालत ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि इस विषय में अनावश्यक देरी उचित नहीं है और सभी औपचारिकताओं को जल्द पूरा किया जाना चाहिए। राज्य सरकार लंबे समय से उन परियोजनाओं को अपने अधीन लेने की तैयारी कर रही है, जिनका निर्माण केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों द्वारा किया जा रहा है।

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इनमें लुहरी स्टेज-1, धौला सिद्ध, सुन्नी बांध और डुग्गर जलविद्युत परियोजनाएं शामिल हैं। इन सभी परियोजनाओं की कुल उत्पादन क्षमता प्रदेश के ऊर्जा क्षेत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

कंपनियों से मांगा गया पूरा वित्तीय ब्योरा

सरकार ने परियोजनाओं का वास्तविक लागत मूल्य निर्धारित करने के लिए संबंधित कंपनियों से विस्तृत वित्तीय जानकारी मांगी है। इसमें वर्षवार ऑडिट बैलेंस शीट, पूंजीगत निवेश, निर्माण कार्यों की प्रगति, भूमि अधिग्रहण पर खर्च, सिविल कार्य, स्थापना व्यय, बैंक ऋण तथा अन्य वित्तीय दायित्वों का पूरा विवरण शामिल है। इन दस्तावेजों के आधार पर यह तय किया जाएगा कि परियोजनाओं पर अब तक कितना निवेश हुआ है।

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साथ ही राज्य सरकार को अधिग्रहण के लिए कितनी राशि का भुगतान करना होगा। सुनवाई के दौरान परियोजना संचालित करने वाली कंपनियों ने अदालत के समक्ष यह भी कहा कि अधिग्रहण प्रक्रिया में लगातार हो रही देरी के कारण निर्माण लागत बढ़ती जा रही है। उनका कहना था कि जितनी देर प्रक्रिया लंबी चलेगी, परियोजनाओं की कुल लागत भी उतनी ही बढ़ेगी, जिससे सभी पक्षों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा।

नई शर्तों पर समझौते की तैयारी

सूत्रों के अनुसार संबंधित कंपनियों ने राज्य सरकार के सामने यह मांग भी रखी है कि निर्माण पर किए गए खर्च के अतिरिक्त 15 प्रतिशत पर्यवेक्षण शुल्क भी दिया जाए। इसी विषय पर सरकार और कंपनियों के बीच आवश्यक दस्तावेजों का आदान-प्रदान जारी है, ताकि अंतिम वित्तीय मूल्यांकन तैयार किया जा सके।

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प्रदेश सरकार भविष्य में जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर नई नीतियों के अनुरूप समझौते करना चाहती है। इसी उद्देश्य से पुराने करारों की समीक्षा भी की जा रही है। सरकार का मानना है कि राज्य के प्राकृतिक संसाधनों से मिलने वाला अधिक लाभ प्रदेश और यहां की जनता को मिलना चाहिए।

हाईकोर्ट ने प्रक्रिया में तेजी लाने को कहा

उच्च न्यायालय ने सुनवाई के दौरान राज्य सरकार को निर्देश दिए कि चारों परियोजनाओं को अपने अधीन लेने की प्रक्रिया निर्धारित नियमों के अनुसार शीघ्र पूरी की जाए। अदालत पहले भी स्पष्ट कर चुकी है कि यदि सरकार परियोजनाएं वापस लेना चाहती है तो निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए कंपनियों को वैधानिक भुगतान करना होगा

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फिलहाल सरकार और कंपनियां आवश्यक दस्तावेजों के आदान-प्रदान की प्रक्रिया पूरी कर रही हैं। यदि यह प्रक्रिया तय समय में पूरी हो जाती है, तो प्रदेश की ऊर्जा नीति, जलविद्युत प्रबंधन और भविष्य की राजस्व व्यवस्था पर इसका महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है।

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