शिमला। कांग्रेस आलाकमान के दवाबों और आदेश पर हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह व्यक्तित्व हमेशा भरी पड़ा। इसके कई किस्से और कहानियां हैं। वीरभद्र सिंह जितने बार भी मुख्यमंत्री पद का शपथ ग्रहण किए उनके प्रतिद्वंदी पार्टी आलाकमान के पास अपना नंबर लगवाते हुए दिखे। हालांकि, राजा साब के सामने आलाकमान की इक्षा भी धरी की धरी रह गई।

सरदार जी, फैसला यहीं करके जाओ; दिल्ली नहीं तय करेगा:

ऐसा ही एक किस्सा है वर्ष 1993 का, तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव सुखराम को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे और उन्होंने कांग्रेस के निर्वाचित विधायकों से बात करने के लिए पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह को केंद्रीय पर्यवेक्षक के तौर पर शिमला भेजा।

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देर रात तक कांग्रेस आलाधिकारियों के साथ बेअंत सिंह की बैठक चली। जिसके बाद बेअंत सिंह ने कहा कि मुख्यमंत्री पर फैसले की घोषणा बाद में दिल्ली में की जाएगी। इस पर वीरभद्र सिंह ने बेअंत सिंह से कहा, ‘सरदार जी, फैसला यहीं करके जाओ। फैसला आलाकमान नहीं करेगा।’ बाद में उनके आगे कांग्रेस आलाकमान को झुकना पड़ा।

विद्या स्टोक्स ने भी ठोकी दावेदारी, राजा के आगे पस्त हो गईं:

मुख्यमंत्री की कुर्सी को सुरक्षित रखने के लिए वीरभद्र सिंह को हमेशा कांग्रेस आलाकमान से लड़ना पड़ता था। जबकि वह हिमाचल हमेशा राज्य के सबसे बड़े कांग्रेसी नेता रहे। हिमाचल की तत्कालीन बुशहर रियासत के वंशज भी थे राजा वीरभद्र सिंह।

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विद्या स्टोक्स ने 2003 में सोनिया गांधी की पसंद होने का इस्तेमाल मुख्यमंत्री बनने के लिए करना चाहा। लेकिन जब वह मुख्यमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी पर सोनिया गांधी का समर्थन हासिल करने दिल्ली पहुंची तो अपना साथ देने के लिए सिर्फ चार विधायकों को ही जुटा पाईं। कांग्रेस आलाकमान को एक बार फिर पीछे हटना पड़ा।

 

अपने स्तर पर पूरी तैयारी के बाद वीरभद्र सिंह ने हिमाचल प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने और 2012 में विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी के मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने की मांग की। लेकिन सोनिया गांधी एक नए चेहरे को लाने के अपने फैसले पर अडिग रहीं। वीरभद्र सिंह उस समय कमजोर नजर आए।

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मैं कांग्रेस के लिए पैदा हुआ था और मरते दम तक कांग्रेस का रहूंगा:

उसी वर्ष जून में भ्रष्टाचार के एक मामले में आरोपित होने के बाद उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना पड़ा था। बहरहाल, वीरभद्र सिंह दिल्ली दरबार के आगे झुकने वाले नहीं थे। जल्द ही यह बात फैल गई कि एनसीपी प्रमुख शरद पवार के आवास पर पार्टी में वीरभद्र सिंह के स्वागत के लिए टेंट लग गए हैं।

 

कांग्रेस आलाकमान ने तुरंत अपना रुख नरम किया और एक दूत उनके पास भेजा। उन्हें जल्द ही राज्य कांग्रेस प्रमुख नियुक्त किया गया और उन्होंने कुछ महीनों बाद चुनाव में पार्टी को जीत भी दिलाई।

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कांग्रेस आलाकमान के साथ अपनी तकरार चलते रहने के बावजूद वीरभद्र सिंह हमेशा पार्टी के प्रति वफादार रहे। वे अक्सर कहते हैं, ‘मैं कांग्रेस के लिए पैदा हुआ था और मरते दम तक कांग्रेस का रहूंगा।’

राजा साहब को हमेशा याद करेंगे लोग

हिमाचल प्रदेश में लोग अक्सर ही पहाड़ी राज्य में बुनियादी ढांचे के विकास- सड़क, अस्पताल, स्कूल, हर गांव में बिजली आदि- में उनके योगदान को याद करते हैं। लेकिन जैसा कि पार्टी में वीरभद्र सिंह के सहयोगी कहते हैं, उन्हें अपने ‘राजा साहब’ के बारे में जो बात सबसे ज्यादा याद रहेगी वह है लोगों के साथ उनका ‘व्यक्तिगत जुड़ाव।’

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