शिमला। हिमाचल प्रदेश में आगामी पंचायत चुनावों को लेकर पंचायतीराज विभाग ने तैयारियां तेज कर दी हैं। इसी कड़ी में अब नए संशोधित नियमों के तहत पंचायतों के लिए आरक्षण रोस्टर तय करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
नए फार्मूले से लगेगा रोस्टर
इस बार का रोस्टर कई मायनों में अहम माना जा रहा है, क्योंकि सरकार ने आरक्षण व्यवस्था में कुछ बदलाव किए हैं- जिनका सीधा असर चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है।
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क्या है नया प्रावधान?
सरकार की ओर से किए गए संशोधन के अनुसार, जिन पंचायतों को वर्ष 2015 और 2020 में लगातार किसी एक श्रेणी के तहत आरक्षित रखा गया था, उन्हें इस बार अनारक्षित करने का प्रावधान किया जा रहा है।
दावेदारों की बढ़ी धुकधुकी
इस फैसले से उन उम्मीदवारों को राहत मिलने की उम्मीद थी, जो लंबे समय से सामान्य श्रेणी में चुनाव लड़ने का इंतजार कर रहे थे। हालांकि, जमीनी स्थिति इतनी सीधी नहीं दिख रही। विभागीय स्तर पर चल रही गणनाओं और आरक्षण के प्रतिशत को देखते हुए कई जगहों पर यह उम्मीद पूरी होती नजर नहीं आ रही।
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क्यों बना हुआ है असमंजस?
रोस्टर का अंतिम स्वरूप अभी जारी नहीं हुआ है, लेकिन संकेत मिल रहे हैं कि कुछ पंचायतें फिर से आरक्षित रह सकती हैं। ऐसे में वे लोग, जो यह मानकर चल रहे थे कि इस बार उनकी पंचायत निश्चित रूप से अनारक्षित होगी, उन्हें झटका लग सकता है।
दरअसल, आरक्षण तय करने में केवल पिछली स्थिति ही नहीं, बल्कि विभिन्न वर्गों की जनसंख्या का अनुपात भी अहम भूमिका निभाता है। यही कारण है कि कई बार एक ही पंचायत को बार-बार आरक्षित करना पड़ जाता है।
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कैसे उलझा रहा मामला?
पंचायतीराज विभाग के अनुसार, पंचायतों में कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक होने के कारण संतुलन बनाना आसान नहीं है। उदाहरण के तौर पर अगर किसी विकास खंड में 62 पंचायतें हैं और वहां अनुसूचित जाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अन्य वर्गों की आबादी के आधार पर आरक्षण लागू किया जाता है, तो उपलब्ध पंचायतों से अधिक आरक्षित सीटों की जरूरत पड़ सकती है।
ऐसी स्थिति में कुछ पंचायतों को दो ही नहीं, बल्कि तीसरी बार भी आरक्षित करना पड़ सकता है। यही स्थिति बड़े विकास खंडों में भी सामने आ रही है, जहां पंचायतों की संख्या अधिक है लेकिन आरक्षण का प्रतिशत उससे भी ज्यादा दबाव बना रहा है।
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क्या खत्म होगी बार-बार आरक्षण की समस्या?
विशेषज्ञों का मानना है कि नए नियमों के बावजूद बार-बार आरक्षण की समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी। इसका मुख्य कारण वही गणितीय असंतुलन है, जिसमें जनसंख्या अनुपात और कुल पंचायतों की संख्या के बीच तालमेल बैठाना मुश्किल हो जाता है। इसका असर खासकर उन सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों पर पड़ रहा है, जिन्हें कई कार्यकाल से चुनाव लड़ने का मौका नहीं मिल पा रहा।
अब सबकी नजर रोस्टर पर
फिलहाल पूरे प्रदेश में उम्मीदवारों और राजनीतिक रूप से सक्रिय लोगों की नजरें अंतिम रोस्टर पर टिकी हुई हैं। रोस्टर जारी होने के बाद ही साफ हो पाएगा कि किन पंचायतों में आरक्षण हटेगा और किन में जारी रहेगा।
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रोस्टर सूची को लेकर हलचल तेज
पंचायत चुनाव से पहले यह प्रक्रिया न केवल प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इससे स्थानीय स्तर की राजनीति की दिशा भी तय होगी। ऐसे में आने वाले दिनों में रोस्टर सूची को लेकर हलचल और तेज होने की संभावना है।
