कुल्लू। देवभूमि कुल्लू एक बार फिर देव आस्था, लोक संस्कृति और व्यापार के सबसे बड़े उत्सव के स्वागत के लिए तैयार हो रही है। भगवान रघुनाथ की नगरी में अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा का आयोजन 21 से 27 अक्टूबर तक ऐतिहासिक ढालपुर मैदान में होगा। उत्सव को लेकर तैयारियां तेज हो गई हैं।
347 देवी-देवताओं को निमंत्रण
इस बार आयोजन में रिकॉर्ड 347 देवी-देवताओं को निमंत्रण भेजा गया है। सात दिन तक चलने वाले इस देव महाकुंभ में सैकड़ों देवी-देवताओं के आगमन से कुल्लू घाटी का माहौल भक्तिमय हो जाएगा। वहीं, मेले में देश के विभिन्न हिस्सों से व्यापारी पहुंचेंगे और बड़े कारोबार की उम्मीद भी जताई जा रही है।
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सदियों पुरानी देव परंपरा
कुल्लू दशहरा की खास पहचान यहां निभाई जाने वाली सदियों पुरानी देव परंपराएं हैं। इस उत्सव में भाग लेने के लिए कई देवी-देवता अपने मूल स्थानों से लंबी यात्रा कर ढालपुर पहुंचते हैं
200 KM पैदल सफर करेंगे तय
बाह्य सराज के आनी और निरमंड क्षेत्रों से आने वाले कुछ देवी-देवताओं के रथों को लेकर देवलू और कारकून करीब 150 से 200 किलोमीटर तक का सफर पैदल तय करेंगे। यह यात्रा केवल उत्सव में भाग लेने का माध्यम नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों की गहरी धार्मिक आस्था और परंपराओं से जुड़ा महत्वपूर्ण हिस्सा है।ट
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15 नए देवी-देवताओं को मिला बुलावा
इस वर्ष कुल्लू दशहरा उत्सव समिति ने 347 देवी-देवताओं को आमंत्रित किया है। वर्ष 2025 में यह संख्या 332 थी। इस तरह इस बार निमंत्रण पाने वाले देवी-देवताओं की संख्या में 15 का इजाफा हुआ है। इनमें आनी-निरमंड क्षेत्र के लगभग 15 से 20 देवी-देवता शामिल हैं।
अलग-अलग क्षेत्रों से आएंगे देवी-देवता
उत्सव में शामिल होने वाले करीब 25 से 30 प्रतिशत देवी-देवताओं को अपने मूल स्थानों से लगभग 100 किलोमीटर या उससे अधिक दूरी तय करनी पड़ेगी। कई देवताओं के साथ देवलू और कारकून पैदल यात्रा करते हुए ढालपुर पहुंचेंगे। कठिन रास्तों और लंबी दूरी के बावजूद इस परंपरा को पूरी श्रद्धा के साथ निभाया जाता है।
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एक स्थान पर एकत्र होंगे देवी-देवता
20 अक्टूबर से देवी-देवताओं के कुल्लू पहुंचने का सिलसिला शुरू होने की संभावना है। उनके आगमन के साथ ही ढालपुर मैदान में अस्थायी शिविरों की रौनक बढ़ने लगेगी। यहां देवलू और कारकून अपने आराध्य के साथ सात दिन तक ठहरेंगे। इस दौरान सुबह और शाम पूजा-अर्चना की जाएगी और पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन होगा।
300 करोड़ के कारोबार का अनुमान
अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा धार्मिक आयोजन के साथ-साथ बड़े व्यापारिक मेले के रूप में भी जाना जाता है। इस बार उत्सव के दौरान 2,500 से अधिक दुकानों के सजने की उम्मीद है। आयोजन से जुड़े कारोबार का अनुमान करीब 300 करोड़ रुपये लगाया जा रहा है। मेले में देश के अलग-अलग राज्यों से व्यापारी पहुंचकर अपने उत्पादों की बिक्री करेंगे।
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ढालपुर में सजेगा व्यापार का बड़ा बाजार
ढालपुर मैदान में लगने वाले बाजार में रोजमर्रा की जरूरतों से लेकर कपड़े, बर्तन, घरेलू सामान और विभिन्न प्रकार के उत्पाद उपलब्ध होते हैं। यहां खरीदारी के लिए स्थानीय लोगों के अलावा आसपास के जिलों और दूसरे राज्यों से भी लोग आते हैं। मेले की बढ़ती रौनक का लाभ छोटे व्यापारियों, दुकानदारों और स्थानीय कारोबारियों को मिलता है।
पर्यटकों की उमड़ेगी भीड़
दशहरा उत्सव के दौरान पर्यटकों की आवाजाही बढ़ने से होटल, टैक्सी, परिवहन और खानपान से जुड़े व्यवसायों को भी फायदा पहुंचता है। इस तरह यह आयोजन कुल्लू की धार्मिक पहचान के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
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भगवान रघुनाथ की रथयात्रा रहता है मुख्य आकर्षण
कुल्लू दशहरा का सबसे खास दृश्य भगवान रघुनाथ की रथयात्रा और उसमें भाग लेने वाले देवी-देवताओं का विशाल जमावड़ा होता है। ढालपुर मैदान में जब अलग-अलग क्षेत्रों के देवी-देवता पहुंचते हैं- तो यहां की देव संस्कृति का अनूठा स्वरूप देखने को मिलता है।
उत्सव को देखने के लिए उत्सुक लोग
देश-विदेश से आने वाले पर्यटक भी इस उत्सव को देखने के लिए उत्सुक रहते हैं। दूसरे स्थानों के दशहरा आयोजनों से अलग, कुल्लू में उत्सव का स्वरूप स्थानीय देव परंपराओं, देवी-देवताओं की भागीदारी और भगवान रघुनाथ के प्रति श्रद्धा से जुड़ा हुआ है। यही विशेषता इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाती है।
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राजा जगत सिंह के समय से जुड़ी है दशहरा मनाने की परंपरा
कुल्लू दशहरा के इतिहास का संबंध 17वीं शताब्दी से माना जाता है। प्रचलित मान्यता के अनुसार, राजा जगत सिंह के शासनकाल में ब्राह्मण दुर्गा दत्त से जुड़ी एक दुखद घटना के बाद राजा गहरे पश्चाताप में चले गए थे। इस स्थिति से उबरने के लिए उन्होंने सिद्धगुरु कृष्णदास पयहारी की शरण ली। मान्यता के मुताबिक, गुरु के निर्देश पर उनके शिष्य दामोदर दास गोसाईं अयोध्या से भगवान राम और सीता की मूर्तियां लेकर कुल्लू पहुंचे।
वर्ष 1660 ईस्वी से चली आ रही परंपरा
कुल्लू में भगवान रघुनाथ की स्थापना और उनके सम्मान में दशहरा मनाने की परंपरा वर्ष 1660 से जोड़ी जाती है। बताया जाता है कि आश्विन महीने की दशमी को भगवान रघुनाथ की अध्यक्षता में यज्ञ किया गया था। इसके बाद से कुल्लू में दशहरा मनाने की परंपरा आगे बढ़ी। वर्ष 1650 में मूर्तियों को अयोध्या से लाए जाने और वर्ष 1660 में ढालपुर में भगवान रघुनाथ की स्थापना से संबंधित घटनाओं का उल्लेख इस ऐतिहासिक परंपरा के संदर्भ में किया जाता है।
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देव संस्कृति और लोक परंपराएं...
भगवान रघुनाथ के कारदार दानवेंद्र सिंह के अनुसार, कुल्लू में दशहरा मनाने की परंपरा वर्ष 1660 से चली आ रही है। समय के साथ इस आयोजन का विस्तार हुआ है, लेकिन भगवान रघुनाथ के प्रति श्रद्धा और देवी-देवताओं की भागीदारी इसकी मूल पहचान बनी हुई है।
कब से कब तक चलेगी दशहरा उत्सव?
इस वर्ष 21 से 27 अक्टूबर तक होने वाले उत्सव में रिकॉर्ड 347 देवी-देवताओं को निमंत्रण, आनी-निरमंड से लंबी पैदल यात्राएं, ढालपुर में सैकड़ों देव शिविर और हजारों दुकानों का बाजार आकर्षण का केंद्र रहेंगे। धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत और व्यापार को एक मंच पर लाने वाला यह आयोजन एक बार फिर कुल्लू की देवभूमि वाली पहचान को देश-दुनिया के सामने प्रस्तुत करेगा।
