शिमला। हिमाचल प्रदेश में विभिन्न कर्मचारी, आउटसोर्स और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े संगठनों के धरना-प्रदर्शन लगातार सरकार की चुनौती बढ़ा रहे हैं। इसी कड़ी में सोमवार को प्रदेशभर की आंगनबाड़ी वर्कर और हेल्परों ने राजधानी शिमला में अपनी ताकत का प्रदर्शन करते हुए सचिवालय के बाहर जोरदार प्रदर्शन किया। इस महिला शक्ति ने सुक्खू सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए राजधानी शिमला को हिलाकर रख दिया। राज्य के विभिन्न जिलों से पहुंचीं सैकड़ों महिलाओं ने सरकार के खिलाफ नारेबाजी की और लंबित मांगों को जल्द पूरा करने की मांग उठाई।

नारी शक्ति के प्रदर्शन से जाम हुई शिमला की सड़कें

सीटू के बैनर तले प्रदेशभर से जुटीं सैकड़ों महिलाओं ने सचिवालय के बाहर ऐसा जोरदार प्रदर्शन किया कि पूरी व्यवस्था चरमरा गई। प्रदर्शन का असर राजधानी की यातायात व्यवस्था पर भी देखने को मिला। बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों के सचिवालय पहुंचने के कारण शिमला की लाइफ लाइन मानी जाने वाली सर्कुलर रोड पर लंबा ट्रैफिक जाम लग गया। कई स्थानों पर वाहनों की लंबी कतारें देखी गईं और पुलिस को यातायात वन-वे कर स्थिति संभालनी पड़ी।

 

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प्रदेशभर में बंद रहे अधिकांश आंगनबाड़ी केंद्र

सीटू के बैनर तले आयोजित इस विरोध प्रदर्शन के चलते प्रदेश के अधिकांश आंगनबाड़ी केंद्रों में कामकाज प्रभावित रहा। किन्नौर, लाहौल-स्पीति, चंबा, सिरमौर, कांगड़ा, मंडी, कुल्लू और अन्य जिलों से बड़ी संख्या में आंगनबाड़ी वर्कर और हेल्पर शिमला पहुंचीं। प्रदर्शनकारी महिलाओं का कहना था कि वर्षों से वे बच्चों के पोषण, स्वास्थ्य और प्रारंभिक शिक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण कार्य कर रही हैं, लेकिन उन्हें आज भी सम्मानजनक मानदेय और सुविधाएं नहीं मिल रही हैं।

चुनावी दहलीज पर खड़ी सरकार को अल्टीमेटम

आंगनबाड़ी कार्यकर्ता यूनियन की राष्ट्रीय महासचिव ऊषा रानी ने सुक्खू सरकार को सीधे शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा कि आज का यह प्रदर्शन तो महज एक सांकेतिक हड़ताल है। यदि सरकार ने उनकी जायज और लंबित मांगों पर तुरंत कोई सकारात्मक फैसला नहीं लिया, तो आने वाली 11 जुलाई को पूरे हिमाचल प्रदेश में 'काला दिवस' मनाया जाएगा, जिसका खामियाजा सरकार को भुगतना पड़ेगा।

 

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मध्य प्रदेश और पंजाब जैसी मांगी सुविधाएं

राज्य में इस समय लगभग 37 हजार आंगनबाड़ी वर्कर और हेल्पर अपनी सेवाएं दे रही हैं, लेकिन उनका आरोप है कि इस कमरतोड़ महंगाई के दौर में उन्हें न्यूनतम वेतन तक नहीं मिल रहा है। वर्तमान में वर्कर को करीब 11,500 रुपये और हेल्पर को मात्र 8,300 रुपये मानदेय दिया जा रहा है। प्रदर्शनकारियों ने सरकार के सामने निम्नलिखित प्रमुख मांगें रखी हैं:

 

  • वेतन और दर्जा: हरियाणा की तर्ज पर मांगा वेतन और मध्यप्रदेश की तर्ज पर वेतन बढ़ोतरी की जाए, न्यूनतम वेतन कानून लागू हो और इन्हें क्लास-3 व क्लास-4 कर्मचारियों का दर्जा मिले।
  • अवकाश और स्वास्थ्य लाभ: पंजाब सरकार की तरह स्पेशल मेडिकल लीव, नियमित अवकाश और ईएसआई (ESI) जैसी स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान की जाएं।
  • संसाधनों का खर्च: कार्यकर्ताओं को विभागीय काम के लिए मोबाइल फोन खुद खरीदना पड़ता है, जबकि सरकार की ओर से मिलने वाला 155 रुपये का मासिक रिचार्ज पैकेज ऊंट के मुंह में जीरे के समान है, इसे बढ़ाया जाए।

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सुबह से शाम तक काम, नाममात्र मानदेय

संगठन का कहना है कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और हेल्पर रीढ़ की हड्डी की तरह काम करती हैं। सुबह बच्चों के पंजीकरण, वजन व कुपोषण की जांच से लेकर गर्भवती महिलाओं को स्वास्थ्य सलाह देने, प्री-स्कूल शिक्षा और पोषण ट्रैकर जैसे डिजिटल रिकॉर्ड संभालने का काम वर्कर करती हैं। वहीं हेल्पर केंद्रों की साफ-सफाई, पौष्टिक आहार तैयार करने और बच्चों को घर से केंद्र तक लाने का जिम्मा उठाती हैं। इतने महत्वपूर्ण और बहुआयामी कार्यों के बावजूद उन्हें बेहद मामूली मानदेय पर गुजारा करना पड़ रहा है, जिससे अब उनके सब्र का बांध टूट गया है।

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सरकार के लिए बढ़ सकती है राजनीतिक चुनौती

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि प्रदेश में विभिन्न वर्गों द्वारा लगातार किए जा रहे विरोध-प्रदर्शन सरकार के लिए चिंता का विषय बन सकते हैं। विशेषकर जब आंगनबाड़ी जैसी बड़ी कार्यबल वाली श्रेणी अपनी मांगों को लेकर सड़क पर उतर रही है, तो इसका असर सामाजिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर दिखाई दे सकता है। फिलहाल सभी की निगाहें सरकार की अगली प्रतिक्रिया पर टिकी हैं। यदि मांगों पर सहमति नहीं बनती है तो आने वाले दिनों में आंदोलन और तेज होने के संकेत मिल रहे हैं।

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