मंडी। हिमाचल प्रदेश की पारंपरिक हस्तशिल्प कला अब देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक अपनी पहचान दर्ज कराने जा रही है। देवभूमि की सदियों पुरानी शिल्प परंपरा से तैयार एक खास रणसिंघा राष्ट्रपति भवन की शान बनने जा रहा है। मंडी जिले के सराज क्षेत्र के थाची गांव के रहने वाले कुशल हस्तशिल्पकार वीर सिंह द्वारा हाथों से तैयार किया गया विशेष रणसिंघा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को स्मृति चिन्ह के रूप में भेंट किया जाएगा।

 

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू आगामी 6 अक्तूबर को बिलासपुर एम्स के पहले दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगी। इसी अवसर पर उन्हें हिमाचल की देव संस्कृति और पारंपरिक शिल्पकला से जुड़ा यह अनूठा स्मृति चिन्ह भेंट किए जाने की तैयारी है।

राष्ट्रपति के लिए खास तौर पर तैयार किया रणसिंघा

वीर सिंह ने राष्ट्रपति के लिए इस रणसिंघे को विशेष रूप से तैयार किया है। यह सामान्य रणसिंघे से अलग एक कलात्मक प्रस्तुति है, जिसमें हिमाचल की पारंपरिक शिल्पकला के साथ समारोह की पहचान को भी जोड़ा गया है। पीतल और तांबे से तैयार किए गए दो रणसिंघों के बीच एम्स बिलासपुर का लोगो अंकित किया गया है। इस तरह यह स्मृति चिन्ह एक ओर हिमाचल की देव परंपरा को प्रदर्शित करता है, तो दूसरी ओर बिलासपुर एम्स के ऐतिहासिक पहले दीक्षांत समारोह की याद को भी अपने भीतर समेटे हुए है।

 

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थाची गांव से राष्ट्रपति तक पहुंचा हुनर

सराज के थाची गांव में तैयार हुआ यह रणसिंघा अब एक लंबी सांस्कृतिक यात्रा तय करते हुए राष्ट्रपति तक पहुंचने जा रहा है। वीर सिंह के परिवार में रणसिंघा बनाने और देवी-देवताओं के मोहरे तैयार करने की कला पीढ़ियों से चली आ रही है। परिवार के शिल्पकार आज भी इस कला को आधुनिक मशीनों पर पूरी तरह निर्भर करने के बजाय पारंपरिक विधियों से आगे बढ़ा रहे हैं। यही वजह है कि उनके बनाए रणसिंघे में केवल धातु की कारीगरी नहीं, बल्कि हिमाचल की लोक और देव संस्कृति की झलक भी दिखाई देती है।

 

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पीएम मोदी और पूर्व राष्ट्रपति को भी दे चुके हैं रणसिंघा

वीर सिंह के हुनर की पहचान इससे पहले भी राष्ट्रीय स्तर पर हो चुकी है। वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को भी अपने हाथों से तैयार किए गए रणसिंघे स्मृति चिन्ह के तौर पर भेंट कर चुके हैं। अब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को रणसिंघा भेंट किया जाना उनके शिल्प सफर में एक और महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है।

देव संस्कृति की आवाज अब राष्ट्रीय पहचान की ओर

हिमाचल के पारंपरिक जीवन में रणसिंघे का स्थान केवल एक वाद्य यंत्र तक सीमित नहीं है। देवी-देवताओं के आगमन, धार्मिक आयोजनों, देव उत्सवों और विभिन्न पारंपरिक समारोहों में रणसिंघे की गूंज देवभूमि की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा रही है। कई क्षेत्रों में जब देवता की शोभायात्रा या धार्मिक आयोजन निकलता है तो रणसिंघे की ध्वनि पूरे वातावरण को विशेष धार्मिक रंग देती है। यही वजह है कि रणसिंघे को हिमाचल की देव संस्कृति के महत्वपूर्ण प्रतीकों में गिना जाता है।

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जीआई टैग से पारंपरिक कला को मिली नई उम्मीद

रणसिंघे को जीआई टैग मिलने के बाद इस पारंपरिक कला से जुड़े शिल्पकारों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान की नई उम्मीद मिली है। जीआई पहचान किसी क्षेत्र विशेष से जुड़ी पारंपरिक वस्तु और उसकी विशिष्टता को पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ऐसे में राष्ट्रपति को भेंट किया जाने वाला वीर सिंह का रणसिंघा सिर्फ एक स्मृति चिन्ह नहीं, बल्कि हिमाचल की पारंपरिक शिल्प विरासत को देश के सामने प्रस्तुत करने का माध्यम भी बनेगा।

‘यंग आर्टिजन’ अवार्ड से भी हो चुके हैं सम्मानित

वीर सिंह को उनके पारंपरिक शिल्प के लिए पिछले वर्ष दिल्ली में ‘यंग आर्टिजन’ अवार्ड से भी सम्मानित किया गया था। इसके बाद उनके बनाए रणसिंघों और देवी-देवताओं के मोहरों की चर्चा हिमाचल से बाहर भी पहुंची। अब राष्ट्रपति के लिए विशेष रणसिंघा तैयार करने का अवसर मिलना इस पारंपरिक कला और इसे पीढ़ियों से जीवित रखने वाले शिल्पकारों के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

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राष्ट्रपति को भेंट होगा हिमाचल की देवभूमि का अनमोल हुनर

बिलासपुर एम्स का पहला दीक्षांत समारोह शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र की उपलब्धि का महत्वपूर्ण अवसर होगा, लेकिन इस समारोह में हिमाचल की सांस्कृतिक विरासत भी अपनी अलग पहचान बनाएगी। जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को मंडी के थाची गांव में तैयार किया गया रणसिंघा स्मृति चिन्ह के रूप में भेंट किया जाएगा, तो इसके साथ सराज की पहाड़ियों से निकला एक पारंपरिक हुनर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंचेगा। यह उस हिमाचली हस्तशिल्प परंपरा के लिए भी गौरव का क्षण होगा, जो पीढ़ियों से हाथों की मेहनत, स्थानीय संस्कृति और देव आस्था को धातु की कलाकृतियों में ढालती आ रही है।

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