बिलासपुर। हिमाचल सरकार जिस ‘शिवा परियोजना’ को बागवानी क्रांति का नया अध्याय बताकर पूरे प्रदेश में प्रचारित कर रही है। वही परियोजना आज बिलासपुर जिले के किसानों के लिए अभिशाप बन चुकी है।

किसान ने की आत्महत्या

नैना देवी विधानसभा क्षेत्र की दयोथ पंचायत के कोठीमझेड़ गांव में इस योजना ने खेती नहीं, बल्कि बर्बादी बो दी है। हालात इतने भयावह हो चुके हैं कि आर्थिक तंगी और मानसिक दबाव से टूटकर एक किसान ने अपनी जान तक दे दी, जबकि दर्जनों परिवार आज दो वक्त की रोटी के लिए जूझ रहे हैं।

विकास’ के नाम पर तबाही

ग्रामीणों का आरोप है कि बागवानी विभाग ने शिवा परियोजना के तहत मुसम्मी के नाम पर ऐसे घटिया और गलत किस्म के पौधे किसानों को थमा दिए- जिनका न तो बाजार में कोई मूल्य है और न ही उन्हें मुसम्मी की श्रेणी में माना जा रहा है।

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मुसम्मी के नाम पर स्कैम

किसानों ने सरकारी भरोसे पर अपनी पारंपरिक खेती छोड़ दी, जमीन तैयार की, सिंचाई की व्यवस्था बदली और सालों तक इन पौधों को खून-पसीने से सींचा। लेकिन जब फसल तैयार हुई और किसान मंडियों तक पहुंचे, तो वहां उन्हें दो टूक जवाब मिला- ये मुसम्मी नहीं हैं।

मंडियों में मिली निराशा

व्यापारियों ने इन फलों को खरीदने से साफ इनकार कर दिया। जिन फसलों से किसानों को आर्थिक संबल मिलने की उम्मीद थी, वही उनकी बर्बादी का कारण बन गईं। किसानों के लिए शिवा परियोजना महज निराशा बनी।

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तीन फसल देने वाली जमीन बनी बंजर

 

पीड़ित किसान शालीराम, राजू राम और सुनील कुमार बताते हैं कि जिस जमीन पर पहले साल में तीन-तीन फसलें होती थीं, वह शिवा प्रोजेक्ट के बाद उजाड़ हो गई। न मुसम्मी बिक पाई और न ही पुरानी खेती पर लौटने की कोई गुंजाइश बची।आर्थिक हालत इस कदर बिगड़ चुकी है कि कई परिवारों में चूल्हा जलाना भी चुनौती बन गया है। बच्चों की पढ़ाई, इलाज और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना असंभव होता जा रहा है।

क्यों की किसान ने आत्महत्या?

ग्रामीणों का दावा है कि जिस किसान ने आत्महत्या की, वह कोई कमजोर या कर्ज में डूबा व्यक्ति नहीं था, बल्कि मेहनतकश और आत्मसम्मानी किसान था। लेकिन सरकारी लापरवाही, गलत पौधों की सप्लाई और भविष्य अंधकारमय होने के डर ने उसे अंदर से तोड़ दिया। गांव में यह चर्चा आम है कि यह आत्महत्या नहीं, बल्कि सिस्टम द्वारा की गई ‘संस्थागत हत्या’ है, जिसमें जिम्मेदार अधिकारी आज भी बेखौफ हैं।

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जांच आई, रिपोर्ट गायब

मामले की गंभीरता तब और बढ़ जाती है, जब यह सामने आता है कि किसानों की शिकायत बागवानी मंत्री जगत सिंह नेगी तक पहुंची थी। दबाव बढ़ने पर मंडी से एक जांच टीम को गांव भेजा गया। टीम ने खेतों का निरीक्षण किया, पौधों और फलों के सैंपल लिए, किसानों के बयान दर्ज किए- लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई।

गलती छुपा रही सरकार

किसानों का आरोप है कि विभाग अपनी भारी गलती छुपाने के लिए रिपोर्ट को फाइलों में दफन किए बैठा है। यदि रिपोर्ट सामने आई, तो गलत पौधों की सप्लाई, गुणवत्ता जांच में लापरवाही और अधिकारियों की जिम्मेदारी उजागर हो जाएगी।

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सवालों का नहीं दे रहा कोई जवाब

इस मामले के सामने के बाद कई सवाल उठ रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि-

  • जब किसानों को दिए गए पौधे मुसम्मी की मानक श्रेणी में थे ही नहीं, तो नर्सरी स्तर पर उनकी गुणवत्ता जांच क्यों नहीं की गई?
  • क्या शिवा परियोजना सिर्फ सरकारी आंकड़े पूरे करने और फाइलों में सफलता दिखाने का माध्यम बन गई है?
  • क्या एक किसान की मौत भी विभाग के आला अधिकारियों को जवाबदेह बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है?
  • जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक करने में आखिर किसका डर है?
  • किसे बचाने की कोशिश की जा रही है?
  • क्या योजनाएं किसानों के लिए हैं या किसान योजनाओं की बलि चढ़ाने के लिए?

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सरकार से न्याय की मांग

पीड़ित किसानों और ग्रामीणों ने सरकार से मांग की है कि जांच रिपोर्ट तुरंत सार्वजनिक की जाए, दोषी अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई हो, गलत पौधों से हुए नुकसान का मुआवजा दिया जाए और मृतक किसान के परिवार को आर्थिक सहायता मिले। उनका साफ कहना है कि अगर आज इस मामले को दबा दिया गया, तो कल शिवा परियोजना किसी और गांव में किसी और किसान की जिंदगी निगल लेगी।

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