रामपुर बुशहर (शिमला): हिमाचल प्रदेश की सुक्खू सरकार में लोक निर्माण विभाग (PWD) का जिम्मा संभाल रहे युवा मंत्री विक्रमादित्य सिंह अक्सर अपने सोशल मीडिया हैंडल्स पर प्रदेश की 'चकाचक' और चमचमाती सड़कों की तस्वीरें अपलोड कर विभाग की पीठ थपथपाते नजर आते हैं। गुणवत्तापूर्ण और टिकाऊ सड़कों के निर्माण को लेकर उनके दावे और भाषण सोशल मीडिया पर खूब सुर्खियां बटोरते हैं। लेकिन, विकास के इन बड़े-बड़ों दावों की जमीनी हकीकत कहीं और नहीं, बल्कि खुद लोक निर्माण मंत्री के अपने ही गृह विधानसभा क्षेत्र रामपुर बुशहर में तार-तार हो गई है।

एक महीने से पहले ही उखड़ी सड़क

शिमला जिला के रामपुर के तकलेच क्षेत्र में हाल ही में बनकर तैयार हुई एक मुख्य सड़क की गुणवत्ता ने विभागीय और सरकारी दावों की पोल खोल कर रख दी है। हैरान करने वाली बात यह है कि इस सड़क पर टायरिंग (कोलतार बिछाने) का काम पूरा हुए अभी महज एक महीना ही बीता है, लेकिन स्थिति इतनी बदतर हो चुकी है कि मानसून की पहली परीक्षा से पहले ही विभाग को इसकी पैचवर्क और मरम्मत का काम शुरू करना पड़ रहा है। इस बदहाली ने PWD की कार्यप्रणाली और विभागीय निगरानी पर बहुत बड़े प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।

 

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विक्रमादित्य सिंह के गुणवत्ता दावों की खुली पोल

स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस सड़क को लोगों की सुविधा और बेहतर यातायात के लिए तैयार किया गया था, वह निर्माण के कुछ ही सप्ताह बाद अपनी गुणवत्ता खोती नजर आ रही है। कई स्थानों पर सड़क की ऊपरी परत प्रभावित होने लगी है, जिससे निर्माण कार्य की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठने लगे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि यदि निर्माण कार्य तय मानकों के अनुरूप किया गया होता तो इतनी जल्दी सड़क की मरम्मत की आवश्यकता नहीं पड़ती। विभाग की इस कार्यप्रणाली ने मंत्री विक्रमादित्य सिंह के सड़कों की गुणवत्ता के दावों की भी पोल खोल दी है।

 

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पंचायत प्रधान ने पहले ही जताई थी आपत्ति

तकलेच पंचायत के प्रधान सुनील कायथ ने लोक निर्माण विभाग और संबंधित ठेकेदार के गठजोड़ पर गंभीर आरोप लगाते हुए इस पूरे मामले को लेकर मोर्चा खोल दिया है। सुनील कायथ ने आरोप लगाया है कि सड़क निर्माण के दौरान ही उन्होंने विभागीय अधिकारियों को कार्य में बरती जा रही कमियों के बारे में अवगत करवाया था। उनका कहना है कि सड़क की आधार परत को मजबूत बनाने के बजाय कई तकनीकी मानकों की अनदेखी की गई, जिसके परिणाम अब सामने आने लगे हैं। प्रधान का दावा है कि यदि निर्माण के दौरान गुणवत्ता पर ध्यान दिया जाता और आवश्यक तकनीकी प्रक्रियाओं का पालन किया जाता तो सड़क इतनी जल्दी क्षतिग्रस्त नहीं होती।

 

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सरकारी धन की बर्बादी का आरोप

नई सड़क की खराब हालत को लेकर स्थानीय लोगों में भारी रोष व्याप्त है। ग्रामीणों का कहना है कि करोड़ों रुपये की लागत से बनने वाली परियोजनाओं का उद्देश्य जनता को बेहतर सुविधाएं देना होता है, लेकिन यदि सड़कें कुछ ही सप्ताह में टूटने लगें तो यह सरकारी धन के सदुपयोग पर सवाल खड़े करता है। लोगों का कहना है कि मानसून के दौरान यदि क्षेत्र में तेज बारिश हुई तो सड़क को और अधिक नुकसान पहुंच सकता है, जिससे भविष्य में दोबारा बड़े खर्च की नौबत आ सकती है।

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PWD की निगरानी व्यवस्था पर उठे सवाल

इस पूरे मामले ने लोक निर्माण विभाग की गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली और निगरानी तंत्र को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। सवाल यह उठ रहा है कि यदि निर्माण कार्य में कोई कमी थी तो विभागीय अधिकारियों ने समय रहते उसे क्यों नहीं रोका? और यदि सब कुछ मानकों के अनुसार हुआ था तो फिर एक महीने में सड़क की हालत क्यों बिगड़ गई? स्थानीय लोगों का कहना है कि मामले की तकनीकी जांच कर यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि निर्माण कार्य में कहीं लापरवाही या घटिया सामग्री का इस्तेमाल तो नहीं हुआ।

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मंत्री तक पहुंचेगा मामला, आंदोलन की चेतावनी

पंचायत प्रतिनिधियों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे इस मुद्दे को दबने नहीं देंगे। पंचायत प्रधान सुनील कायथ ने कहा है कि सड़क निर्माण में बरती गई कथित अनियमितताओं और गुणवत्ता संबंधी शिकायतों को लेकर लोक निर्माण मंत्री के समक्ष मामला उठाया जाएगा। उन्होंने मांग की है कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच करवाई जाए और यदि किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है तो संबंधित अधिकारियों और ठेकेदारों की जवाबदेही तय की जाए। जनता ने अल्टीमेटम दिया है कि यदि उनके खिलाफ कोई सख्त कानूनी कार्रवाई नहीं की गई, तो क्षेत्र की जनता लोक निर्माण विभाग के खिलाफ सड़कों पर उतरकर उग्र आंदोलन शुरू करने से भी पीछे नहीं हटेगी।

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