चंबा। आस्था, परंपरा और सेवा भाव से जुड़े धार्मिक स्थलों पर लिए गए प्रशासनिक फैसले अक्सर लोगों की भावनाओं से सीधे जुड़ जाते हैं। जब बात सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं की हो- तो किसी भी तरह का बदलाव या नियम लोगों के बीच बहस और विरोध का कारण बन जाता है।

भंडारे लगाने पर शुल्क

कुछ ऐसा ही मामला हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले से सामने आया है, जहां एक फैसले ने श्रद्धालुओं और धार्मिक संगठनों में असंतोष पैदा कर दिया है। चौरासी मंदिर परिसर में लंगर और भंडारे पर शुल्क लगाने के जिला प्रशासन के फैसले को लेकर विवाद गहराता जा रहा है।

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2500 रुपये देनी होगी फीस

नई एडवाइजरी के तहत अब मंदिर परिसर में एक दिन का लंगर लगाने के लिए ₹1000 और दो दिन के लिए ₹2500 शुल्क निर्धारित किया गया है। इसके अलावा किसी भी धार्मिक आयोजन, शिव पूजन (नुआला) या लंगर सेवा के लिए कम से कम तीन दिन पहले प्रशासन को सूचना देकर अनुमति लेना अनिवार्य कर दिया गया है।

 

श्रद्धालुओं में भारी नाराजगी

इस फैसले के सामने आते ही स्थानीय लोगों, श्रद्धालुओं और विभिन्न धार्मिक संगठनों में नाराजगी फैल गई है। लोगों का कहना है कि चौरासी मंदिर परिसर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आस्था, सेवा और सनातन परंपराओं का जीवंत केंद्र है, जहां वर्षों से श्रद्धालु बिना किसी शुल्क के लंगर और भंडारे आयोजित करते आए हैं।

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लंगरों पर नहीं लगना चाहिए शुल्क

खासतौर पर मणिमहेश यात्रा के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु सेवा भाव से लंगर लगाते हैं और इसे पुण्य का कार्य मानते हैं। स्थानीय निवासियों का तर्क है कि इस तरह का शुल्क लगाना धार्मिक परंपराओं के विपरीत है।

 

आर्थिक दायरे में बांधना नहीं उचित

उनका कहना है कि लंगर सिर्फ खाना बांटना या खिलाना नहीं है , बल्कि सेवा और श्रद्धा का प्रतीक है। ऐसे में इसे किसी भी तरह के आर्थिक दायरे में बांधना उचित नहीं है।

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मामले ने लिया सियासी रंग

मामले ने सियासी रंग भी ले लिया है। क्षेत्र के विधायक डॉ. जनक राज ने प्रशासन के इस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि चौरासी प्रांगण में शिव पूजन और नुआला जैसे धार्मिक कार्यों के लिए केवल श्रद्धा और विश्वास ही काफी हैं, इसके लिए प्रशासनिक अनुमति को अनिवार्य बनाना सही नहीं है। उन्होंने प्रशासन से इस निर्णय पर पुनर्विचार करने और इसे संशोधित करने की बात कही है।

 

पुजारियों ने भी किया विरोध

वहीं, मंदिर से जुड़े पुजारी वर्ग ने भी इस फैसले का खुलकर विरोध किया है। रवि दत्त और कन्हैयालाल का कहना है कि लंगर जैसी पवित्र परंपरा पर शुल्क थोपना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। उन्होंने इसे श्रद्धालुओं की भावनाओं के खिलाफ बताया और प्रशासन से तुरंत इस आदेश को वापस लेने की मांग की।

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फैसला वापस ले प्रशासन

स्थानीय लोगों ने प्रशासन को सुझाव भी दिए हैं। उनका कहना है कि अगर प्रशासन को मंदिर परिसर में स्वच्छता और व्यवस्था बनाए रखने की चिंता है, तो इसके लिए अलग से ठोस कदम उठाए जा सकते हैं। जैसे कूड़ेदान की उचित व्यवस्था, सफाई कर्मचारियों की तैनाती और निगरानी बढ़ाना। मगर सेवा भाव से लगाए जाने वाले लंगर पर शुल्क लगाना समस्या का समाधान नहीं है।

मुद्दे को लेकर बढ़ रहा विरोध

फिलहाल, इस मुद्दे को लेकर क्षेत्र में विरोध लगातार बढ़ रहा है और लोग प्रशासन से फैसले को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। आने वाले दिनों में प्रशासन इस पर क्या रुख अपनाता है, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि यह मामला सीधे तौर पर आस्था, परंपरा और लोगों की धार्मिक भावनाओं से जुड़ा हुआ है।

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