#अव्यवस्था
April 29, 2026
सुक्खू सरकार ने बेरोजगारों से किया धोखा : रेगुलर पोस्ट हटाकर ठेका भर्ती शुरू, 500 पद किए खत्म
अभ्यर्थियों के बीच भी सरकार की नीतियों को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं
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शिमला। हिमाचल प्रदेश में सुक्खू सरकार ने बेरोजगारों को बड़ा झटका दिया है। सुक्खू सरकार ने वन विभाग की भर्ती व्यवस्था में बड़ा बदलाव करते हुए एक अहम फैसला लिया है।
सरकार ने फॉरेस्ट गार्ड के 500 नियमित पदों को समाप्त कर उनकी जगह 500 असिस्टेंट फॉरेस्ट गार्ड के नए पद सृजित करने की अधिसूचना जारी कर दी है। यह निर्णय तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया गया है- जिससे विभागीय ढांचे और भर्ती प्रक्रिया दोनों पर असर पड़ना तय माना जा रहा है।
अतिरिक्त मुख्य सचिव (वन) कमलेश कुमार पंत द्वारा जारी आदेशों में स्पष्ट किया गया है कि अब इन नए पदों पर नियुक्ति नियमित वेतनमान के बजाय तय मानदेय पर की जाएगी। असिस्टेंट फॉरेस्ट गार्ड के रूप में चयनित होने वाले अभ्यर्थियों को 16,000 रुपये प्रतिमाह फिक्स सैलरी दी जाएगी।
इससे पहले जहां फॉरेस्ट गार्ड के पद नियमित श्रेणी में आते थे, वहीं अब नई व्यवस्था में इन्हें अस्थायी स्वरूप दिया गया है। सरकार ने इन पदों में 50 प्रतिशत आरक्षण वन मित्रों के लिए निर्धारित किया है।
नियुक्तियों में रोस्टर प्रणाली लागू होगी, जिससे विभिन्न वर्गों को नियमानुसार अवसर मिल सके। खास बात यह है कि वन मित्रों के लिए किसी प्रकार का अनुभव अनिवार्य नहीं रखा गया है, जिससे इस श्रेणी के अधिक लोगों को मौका मिलने की संभावना है।

हालांकि, इस नई भर्ती को लेकर कई सवाल भी उठ रहे हैं। अधिसूचना में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि ये नियुक्तियां कितने समय के लिए होंगी और भविष्य में इन्हें नियमित किया जाएगा या नहीं। इसी वजह से युवाओं के बीच असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
गौरतलब है कि प्रदेश में सत्ता में आने से पहले कांग्रेस ने बड़े पैमाने पर रोजगार देने और स्थायी नौकरियों का वादा किया था। लेकिन वर्तमान में सरकार की ओर से वन मित्र, पशु मित्र और स्टाफ नर्स जैसे पदों पर भी नियमित भर्ती के बजाय मानदेय आधारित नियुक्तियां की जा रही हैं।
इससे विपक्ष के साथ-साथ अभ्यर्थियों के बीच भी सरकार की नीतियों को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। इससे पहले भी वन विभाग में वन मित्रों की भर्ती 10,000 रुपये प्रतिमाह के मानदेय पर की गई थी।
अब असिस्टेंट फॉरेस्ट गार्ड के पदों के लिए 16,000 रुपये तय किए जाने से यह संकेत मिल रहा है कि सरकार फिलहाल स्थायी नौकरियों के बजाय कम लागत वाली अस्थायी भर्ती व्यवस्था को प्राथमिकता दे रही है। ऐसे में आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि सरकार इन पदों को लेकर आगे क्या नीति अपनाती है और युवाओं की उम्मीदों पर कितना खरा उतर पाती है।