#अव्यवस्था
May 3, 2026
हिमाचल: नर्स बनने आई बेटियां बनी 'मरीज' हॉस्टल में 'नर.कीय जीवन' का खुलासा; बंदर भगाने की ड्यूटी..
जांच रिपोर्ट में हुए सनसनीखेज खुलासे, खुली बदहाल सिस्टम की परतें
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शिमला। हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले के रामपुर स्थित सरकारी नर्सिंग संस्थान खनेरी से एक ऐसा रूह कंपा देने वाला मामला सामने आया है, जिसने प्रदेश की स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। दूसरों का इलाज करने का सपना लेकर आई 90 छात्राओं में से 19 छात्राएं टीबी संक्रमण की चपेट में आ गई हैं। यह खुलासा तब हुआ जब छात्राओं की हालत बिगड़ने लगी और एसडीएम द्वारा किए गए औचक निरीक्षण की रिपोर्ट सार्वजनिक हुई।
एसडीएम की जांच रिपोर्ट के अनुसार संस्थान का हॉस्टल किसी जेल से कम नहीं है। हॉस्टल के सीलन भरे कमरों में क्षमता से अधिक छात्राओं को ठूंसा जाता था। एक-क कमरे में 15-15 लड़कियां रहने को मजबूर थीं। स्थिति इतनी बदतर है कि कई छात्राओं को एक ही बिस्तर साझा करना पड़ रहा है।
इतना ही नहीं हॉस्टल में 85 छात्राओं के लिए केवल 3 शौचालय हैं। जो हर समय गंदगी से भरे रहते हैं। इन शौचालयों की सफाई के लिए कोई भी कर्मचारी तैनात नहीं किया गया था। यह काम भी छात्राओं को खुद ही करना पड़ता था। हॉस्टल में 10-10 दिन बाद पानी आता था। पानी ना आने से शौचालयों में गंदगी भर जाती थी। पानी ना आने के डर से छात्राएं खाना तक छोड़ देती थीं ताकि उन्हें टॉयलेट न जाना पड़े।

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संस्थान में केवल छात्राओं की सेहत से ही नहीं, बल्कि उनके हक के पैसों से भी खिलवाड़ हो रहा है। रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि छात्राओं से हर महीने 3600 रुपये मेस शुल्क लिया जाता था, लेकिन बदले में उन्हें बेहद खराब गुणवत्ता का भोजन दिया जाता था। खाने में सूखी रोटी और सब्जी परोसी जाती थी।
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पोषणयुक्त आहार जैसे दाल- फल, अंडे लगभग नदारद थे। आरोप है कि मेस का टेंडर 2009 के बाद से कभी नहीं हुआ और सालाना करीब 38 लाख रुपये के लेन-देन का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड मौजूद नहीं है। भुगतान भी ऑनलाइन के बजाय नकद लिया जाता था, जिससे वित्तीय अनियमितताओं की आशंका और गहरा गई है।
छात्राओं ने जो खुलासे किए हैं, वे हैरान करने वाले हैं। पढ़ाई के बजाय उनसे अमानवीय काम करवाए जा रहे हैं। छात्राओं का आरोप है कि नर्सिंग की पढ़ाई करवाने की बजाए उनसे ऐसे काम करवाए जाते थे, जो इसका हिस्सा ही नहीं थे। पढ़ाई के नाम पर उनकी ड्यूटी बंदर भगाने के लिए लगाई जाती थी। छात्राओं को अस्पताल के गेट पर बंदर भगाने के लिए 4-4 घंटे की शिफ्ट में खड़ा किया जाता है। इसके अलावा टॉयलेट साफ करना, मेस की सफाई और पूजा ड्यूटी भी छात्राओं से जबरन करवाई जाती थी।

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संस्थान में छात्राओं पर मानसिक दबाव के भी आरोप सामने आए हैं। सबसे शर्मनाक आरोप प्रिंसिपल पर लगे हैं। कुछ छात्राओं ने दावा किया कि शिकायत उठाने पर उन्हें धार्मिक मान्यताओं का डर दिखाया गया। यहां तक कि एक.एक रुपये लेकर देवता के नाम पर चढ़ाने और शिकायत करने वालों के साथ बुरा होने की बात कही गई।
हॉस्टल में न तो कोई सुरक्षा गार्ड है और न ही वार्डन। रात के समय मेस के दो पुरुष कर्मचारी वहीं रुकते हैं, जो छात्राओं की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े करता है। परिजनों का आरोप है कि उनकी बेटियों को पिछले 4 महीने से टीबी की दवा दी जा रही थी, लेकिन उन्हें सूचित तक नहीं किया गया।

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प्रशासन की ओर से अब छात्राओं के इलाज का दावा किया जा रहा है और जांच के लिए कमेटी गठित की गई है। हालांकि, सवाल अब भी बरकरार हैं—जब निरीक्षण में खामियां पहले ही सामने आ चुकी थीं तो सुधार क्यों नहीं हुआ? करोड़ों के लेन-देन का हिसाब कहां है? और सबसे बड़ा सवाल—क्या जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी या मामला ठंडे बस्ते में चला जाएगा?
यह घटना केवल एक संस्थान की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े करती है। जो बेटियां नर्स बनने का सपना लेकर यहां आई थीं, वही आज बदइंतजामी और लापरवाही के चलते खुद इलाज के लिए मजबूर हैं।