धर्मशाला। हिमाचल प्रदेश में कई दशकों से रह रहे तिब्बती शरणार्थियों की बस्तियों पर अब बेदखली का खतरा मंडराने की चिंता बढ़ गई है। वन भूमि से अतिक्रमण हटाने को लेकर हाईकोर्ट के आदेशों के बाद तिब्बती शरणार्थी समुदाय अपने भविष्य को लेकर चिंतित है। इस बीच सेंट्रल तिब्बतन रिलीफ कमेटी (सीटीआरसी) ने प्रदेश की सुक्खू सरकार और केंद्रीय गृह मंत्रालय से राहत की गुहार लगाई है। समिति चाहती है कि पुराने समय में सरकारी सहमति से बसाए गए तिब्बती परिवारों के मामलों को सामान्य अतिक्रमण के मामलों से अलग रखकर देखा जाए।
तिब्बती शरणार्थियों की चिंता इसलिए बढ़ गई है, क्योंकि प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में स्थित उनकी पुरानी बस्तियों और धार्मिक स्थलों पर कार्रवाई की आशंका जताई जा रही है। समिति का कहना है कि इन परिवारों को दशकों पहले पुनर्वास प्रक्रिया के तहत यहां बसाया गया था। ऐसे में उनके निवास और पुनर्वास से जुड़े ऐतिहासिक दस्तावेजों को ध्यान में रखे बिना कोई कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए।
हाईकोर्ट के आदेशों के बाद बढ़ी चिंता
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट की ओर से वन भूमि से अतिक्रमण हटाने के निर्देशों के बाद तिब्बती शरणार्थियों के बीच भविष्य को लेकर असमंजस की स्थिति बन गई है। सीटीआरसी ने इस मामले में राज्य सरकार और केंद्रीय गृह मंत्रालय के समक्ष अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि पुरानी तिब्बती बस्तियों की स्थिति को अलग नजरिए से देखने की जरूरत है।
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समिति के अनुसार, कई बस्तियां वन संरक्षण अधिनियम, 1980 लागू होने से पहले स्थापित हो चुकी थीं। इन स्थानों पर रहने वाले परिवार लंबे समय से यहां रह रहे हैं और उनके पुनर्वास का इतिहास भी पुराना है। इसलिए समिति ने आग्रह किया है कि इन बस्तियों को हाल के वर्षों में हुए कथित अतिक्रमणों के समान श्रेणी में न रखा जाए।
हालांकि, समिति ने स्पष्ट किया है कि वह हाईकोर्ट के आदेशों का विरोध नहीं कर रही है। उसकी मांग है कि पुराने पुनर्वास मामलों के लिए कानूनी और नीतिगत पहलुओं को ध्यान में रखते हुए अलग व्यवस्था बनाई जाए।
मैकलोडगंज से रिवालसर तक प्रभावित होने की आशंका
सीटीआरसी ने अपने प्रतिवेदन में हिमाचल प्रदेश के कई क्षेत्रों में स्थित तिब्बती बस्तियों और धार्मिक स्थलों को लेकर चिंता जताई है। समिति के अनुसार, कांगड़ा, मंडी और कुल्लू-मनाली क्षेत्र की कुछ बस्तियों पर बेदखली की कार्रवाई का असर पड़ सकता है।
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मैकलोडगंज में करीब 218 तिब्बती परिवारों और रिवालसर में 42 ध्यान गुफाओं व धार्मिक स्थलों को लेकर विशेष चिंता जताई गई है। समिति का कहना है कि इन स्थानों का तिब्बती समुदाय के सामाजिक और धार्मिक जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। ऐसे में किसी भी कार्रवाई से पहले संबंधित परिवारों और संस्थानों की स्थिति की विस्तृत जांच होनी चाहिए। समिति ने सरकार से आग्रह किया है कि इन बस्तियों के पुराने रिकॉर्ड, पुनर्वास से जुड़े दस्तावेजों और ऐतिहासिक परिस्थितियों का आकलन करने के बाद ही आगे का निर्णय लिया जाए।
2014 और 2015 की पुनर्वास नीतियों का दिया हवाला
तिब्बती शरणार्थियों की राहत की मांग के समर्थन में सीटीआरसी ने केंद्रीय पुनर्वास नीति-2014 और हिमाचल प्रदेश की वर्ष 2015 की नीति का उल्लेख किया है। समिति की दलील है कि इन नीतियों के तहत वास्तविक रूप से पुनर्वासित लोगों और जानबूझकर सरकारी या वन भूमि पर कब्जा करने वालों के मामलों में अंतर किया जाना चाहिए।
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समिति का कहना है कि दशकों पहले बसाए गए परिवारों की स्थिति को समझने के लिए उनके पुनर्वास का इतिहास और उपलब्ध दस्तावेज महत्वपूर्ण हैं। उसके अनुसार, लंबे समय से निवास कर रहे परिवारों के मामले में निर्णय लेते समय इन तथ्यों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
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अब सीटीआरसी चाहती है कि राज्य और केंद्र सरकार इन नीतियों के प्रावधानों का अध्ययन कर तिब्बती शरणार्थियों के पुराने पुनर्वास मामलों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश तैयार करें, ताकि कानूनी स्थिति स्पष्ट होने के साथ प्रभावित परिवारों की चिंताओं का समाधान भी हो सके।
कार्रवाई से पहले समाधान निकालने की अपील
सीटीआरसी ने सरकार से मांग की है कि जब तक इस मामले का कानूनी और नीतिगत समाधान नहीं निकलता, तब तक संबंधित बस्तियों में तोड़फोड़ या जबरन बेदखली जैसी कार्रवाई रोकने पर विचार किया जाए।
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समिति ने इस उद्देश्य से मुख्य सचिव, वन विभाग और केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधिकारियों की संयुक्त अंतर-विभागीय बैठक बुलाने का आग्रह किया है। उसका मानना है कि केंद्र और राज्य सरकार के बीच समन्वय से पुराने पुनर्वास मामलों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट की जा सकती है और उचित समाधान तलाशा जा सकता है।
सुक्खू सरकार के सामने कानूनी और मानवीय पहलुओं में संतुलन की चुनौती
तिब्बती शरणार्थियों की मांग के बाद यह मामला राज्य सरकार के लिए संवेदनशील बन गया है। एक ओर हाईकोर्ट के आदेशों के अनुपालन और वन भूमि से अतिक्रमण हटाने का दायित्व है, तो दूसरी ओर दशकों पहले पुनर्वास के तहत बसाए गए परिवारों की स्थिति और उनके दावों पर विचार करने की जरूरत है। अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि सुक्खू सरकार और केंद्रीय गृह मंत्रालय सीटीआरसी के प्रतिवेदन पर क्या रुख अपनाते हैं। फिलहाल समिति की ओर से राहत की मांग की गई है, लेकिन संबंधित बस्तियों को लेकर किसी अंतिम सरकारी निर्णय या कार्रवाई पर रोक की आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है।
