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October 9, 2026

हिमाचल हाईकोर्ट ने सुक्खू सरकार की नीति को बताया अवैध, कर्मचारियों के हक में सुनाया बड़ा फैसला

हाईकोर्ट ने सरकार की मनमर्जी से तारीखें तय करने की नीति को बताया अवैध

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शिमला: हिमाचल प्रदेश में सरकारी कर्मचारियों के वेतन और पदोन्नति से जुड़े मामले में हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार की नीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अदालत ने स्वास्थ्य शिक्षकों के वेतनमान से जुड़े विवाद में कर्मचारियों को राहत देते हुए सरकार की ओर से अलग-अलग श्रेणियों के लिए लाभ की तारीख तय करने की व्यवस्था को अवैध ठहराया है। इस फैसले को कर्मचारियों के अधिकारों की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वहीं, सुक्खू सरकार को अदालत से लगे इस झटके ने सरकारी नीतियों और वेतन निर्धारण की प्रक्रिया को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

 

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि किसी कर्मचारी को पदोन्नति मिलने के बाद उसके उच्च पद का वेतनमान उसके निचले फीडर पद के वेतनमान से कम या उसके बराबर नहीं रखा जा सकता, जब दोनों पदों की योग्यता, जिम्मेदारियों और पदानुक्रम में स्पष्ट अंतर हो। न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति रंजन शर्मा की खंडपीठ ने शशि पाल ठाकुर सहित 58 याचिकाकर्ताओं की याचिका स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया।

 

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सरकार की अधिसूचना रद्द

हाईकोर्ट ने 30 जनवरी 2016 को जारी उस सरकारी अधिसूचना को रद्द कर दिया, जिसके तहत स्वास्थ्य शिक्षकों को 4,200 रुपये ग्रेड पे तो दिया गया, लेकिन इसका लाभ 1 अक्टूबर 2012 के बजाय 1 फरवरी 2016 से लागू किया गया था। अदालत ने इस व्यवस्था को मनमाना मानते हुए सरकार को कर्मचारियों के वेतनमान पर दोबारा विचार करने का निर्देश दिया।

 

इस मामले में विवाद की जड़ वर्ष 2012 में जारी वेतन संशोधन से जुड़ी है। स्वास्थ्य विभाग में मल्टीपर्पज हेल्थ सुपरवाइजर के पद को स्वास्थ्य शिक्षक का फीडर कैडर माना जाता है। स्वास्थ्य शिक्षक का पद उच्च और पदोन्नति से जुड़ा हुआ है। दोनों पदों के लिए निर्धारित शैक्षणिक योग्यता में भी अंतर है।

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स्वास्थ्य शिक्षक के पद के लिए स्नातक डिग्री के साथ स्वास्थ्य शिक्षा में डिप्लोमा आवश्यक है, जबकि मल्टीपर्पज हेल्थ सुपरवाइजर के पद के लिए मैट्रिक और प्रशिक्षण प्रमाणपत्र की योग्यता निर्धारित थी। इसके बावजूद वेतन निर्धारण के दौरान उच्च पद पर कार्यरत स्वास्थ्य शिक्षकों को अपने अधीनस्थ पद के कर्मचारियों के बराबर ग्रेड पे मिलने लगा।

2012 से शुरू हुआ विवाद

विवाद के अनुसार, राज्य सरकार ने 28 सितंबर 2012 को संशोधित वेतन नियमों के तहत अधिसूचना जारी कर मल्टीपर्पज हेल्थ सुपरवाइजर का ग्रेड पे बढ़ाकर 4,200 रुपये कर दिया था। यह लाभ 1 अक्टूबर 2012 से प्रभावी हुआ। दूसरी ओर, स्वास्थ्य शिक्षकों का ग्रेड पे 3,800 रुपये ही बना रहा। इससे स्थिति ऐसी बन गई कि उच्च पद पर कार्यरत कर्मचारियों को अपने ही अधीनस्थ कर्मचारियों से कम ग्रेड पे मिलने लगा। कर्मचारियों ने इस विसंगति को लेकर विरोध जताया और सरकार से वेतनमान में सुधार की मांग की।

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इसके बाद सरकार ने 30 जनवरी 2016 को नई अधिसूचना जारी कर स्वास्थ्य शिक्षकों का ग्रेड पे भी 4,200 रुपये कर दिया। हालांकि, सरकार ने इस लाभ को पिछली तारीख यानी 1 अक्टूबर 2012 से लागू करने के बजाय 1 फरवरी 2016 से प्रभावी माना। इसी निर्णय को कर्मचारियों ने अदालत में चुनौती दी।

पिक एंड चूज नीति पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सरकार की ओर से लाभ देने के लिए अलग-अलग प्रभावी तारीखें निर्धारित करने की व्यवस्था पर आपत्ति जताई। अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकार को यह असीमित अधिकार नहीं दिया जा सकता कि वह अपनी मर्जी से किसी कर्मचारी वर्ग को एक तारीख से और दूसरे वर्ग को कई वर्ष बाद उसी लाभ का हकदार बनाए।

 

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अदालत के अनुसार, वेतन निर्धारण में ऐसी विसंगतियां, जिनसे उच्च पद पर कार्यरत कर्मचारियों को निचले पद के बराबर या उससे कम वेतनमान मिलता है, समानता के संवैधानिक सिद्धांतों के विपरीत हो सकती हैं। कोर्ट ने इस मामले में संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता के अधिकार से जुड़े पहलुओं पर भी विचार किया।

 

खंडपीठ ने विशेषज्ञ समिति की उस सिफारिश पर भी सवाल उठाए, जिसमें नियमों में आवश्यक बदलाव किए बिना पदोन्नति से जुड़े पदनाम को बदलकर प्लेसमेंट का रूप देने की बात कही गई थी। अदालत ने इस प्रक्रिया को मनमाना माना।

कर्मचारियों को 2012 से मिलेगा संशोधित वेतनमान का लाभ

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को स्वास्थ्य शिक्षकों के मामले पर नए सिरे से विचार करने और उन्हें फीडर पद के मुकाबले उचित रूप से अधिक ग्रेड पे देने का निर्देश दिया है। अदालत के आदेश के अनुसार, संशोधित उच्च वेतनमान को 1 अक्टूबर 2012 से काल्पनिक रूप से प्रभावी माना जाएगा।

 

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इसके साथ ही कर्मचारियों को वास्तविक वित्तीय लाभ के लिए भी राहत दी गई है। फैसले के मुताबिक, याचिका दाखिल करने की तारीख 15 सितंबर 2016 से पिछले तीन वर्षों की अवधि यानी 15 सितंबर 2013 से वास्तविक मौद्रिक लाभ की गणना कर संबंधित कर्मचारियों को एरियर दिया जाएगा। इससे प्रभावित कर्मचारियों को लंबे समय से चली आ रही वेतन विसंगति के मामले में आर्थिक राहत मिलने का रास्ता साफ हुआ है।

सरकारी कर्मचारियों के लिए अहम फैसला

हिमाचल हाईकोर्ट का यह निर्णय केवल स्वास्थ्य शिक्षकों के वेतन विवाद तक सीमित नहीं, बल्कि सरकारी कर्मचारियों के वेतन निर्धारण, पदोन्नति और समानता से जुड़े सिद्धांतों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। अदालत ने साफ संदेश दिया है कि प्रशासनिक फैसलों में मनमाने ढंग से लाभ की तारीखें तय नहीं की जा सकतीं और उच्च पद की जिम्मेदारियों तथा पात्रता को नजरअंदाज करके वेतनमान निर्धारित नहीं किया जाना चाहिए।

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