शिमला। हिमाचल प्रदेश विधानसभा का मानसून सत्र मंगलवार को सरकार और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक के साथ-साथ विधानसभा के बाहर कर्मचारियों के जोरदार प्रदर्शन के कारण भी सुर्खियों में रहा। सदन के अंदर आउटसोर्स भर्ती के मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने नजर आए, तो विधानसभा परिसर के बाहर सैकड़ों आउटसोर्स कर्मचारियों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। चौड़ा मैदान में जुटे कर्मचारियों ने नौकरी की सुरक्षा, सम्मानजनक मानदेय और स्थायी नीति की मांग को लेकर जमकर नारेबाजी की।
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एक तरफ विधानसभा के भीतर विपक्ष ने आउटसोर्स भर्ती के मुद्दे पर सरकार को घेरा और हंगामे के बीच वॉकआउट किया, तो दूसरी तरफ सदन के बाहर प्रदर्शन कर रहे कर्मचारियों ने साफ कर दिया कि वर्षों तक सरकारी विभागों में सेवाएं देने के बावजूद अगर उनका भविष्य सुरक्षित नहीं किया गया तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा।
विधानसभा के बाहर कर्मचारियों का शक्ति प्रदर्शन
मानसून सत्र के दौरान मंगलवार को आउटसोर्स कर्मचारियों का मुद्दा विधानसभा के अंदर और बाहर दोनों जगह छाया रहा। विपक्ष ने आउटसोर्स भर्ती और कर्मचारियों के भविष्य को लेकर सरकार पर सवाल उठाए। मुद्दे को लेकर सदन में माहौल गरमाया और सत्ता पक्ष तथा विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली।
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वहीं, विधानसभा से बाहर चौड़ा मैदान में प्रदेशभर से पहुंचे आउटसोर्स कर्मचारियों ने अपनी मांगों को लेकर जोरदार प्रदर्शन किया। बड़ी संख्या में कर्मचारियों की मौजूदगी ने सरकार पर दबाव बढ़ा दिया। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि एक ही दिन में विधानसभा के भीतर भी उनकी आवाज गूंजी और बाहर भी हजारों परिवारों की चिंता लेकर कर्मचारी सड़क पर उतर आए।
25 हजार आउटसोर्स कर्मचारियों के भविष्य पर सवाल
आउटसोर्स कर्मचारी संघ के अनुसार प्रदेश के विभिन्न सरकारी विभागों में करीब 25 हजार कर्मचारी आउटसोर्स आधार पर सेवाएं दे रहे हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे कर्मचारियों की है, जो 15 से 20 वर्षों से लगातार सरकारी विभागों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। कर्मचारियों का कहना है कि वर्षों तक काम करने के बावजूद उनके लिए नौकरी की कोई स्थायी सुरक्षा नहीं है।
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उन्हें हर समय इस बात की चिंता बनी रहती है कि उनकी नौकरी कब खत्म हो जाए। प्रदर्शनकारियों ने सवाल उठाया कि अगर कोई कर्मचारी डेढ़ या दो दशक तक किसी विभाग में सेवाएं दे चुका है, तो उसके भविष्य को सुरक्षित करने के लिए सरकार की ओर से ठोस नीति क्यों नहीं बनाई जा रही है।
12 हजार रुपये के मानदेय पर परिवार चलाना मुश्किल
आउटसोर्स कर्मचारियों ने कम मानदेय का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया। उनका दावा है कि अधिकांश कर्मचारियों को करीब 12 हजार रुपये मासिक मानदेय मिल रहा है। कर्मचारियों का कहना है कि मौजूदा महंगाई में इतने कम मानदेय से परिवार की जरूरतें पूरी करना लगातार मुश्किल होता जा रहा है। घर का किराया, बच्चों की पढ़ाई, राशन, बिजली-पानी और अन्य खर्चों के बीच कम आय में परिवार चलाना उनके लिए बड़ी चुनौती बन चुका है। प्रदर्शनकारियों ने सरकार से मांग की कि लंबे समय से सेवाएं दे रहे कर्मचारियों के अनुभव और कार्यकाल को देखते हुए उनके लिए सम्मानजनक वेतन और नौकरी की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
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एक दशक से नीति का इंतजार
आउटसोर्स कर्मचारी लंबे समय से अपने लिए ठोस नीति की मांग कर रहे हैं। कर्मचारियों का कहना है कि करीब एक दशक से वे सरकारों के सामने अपनी मांग रखते आए हैं। पूर्व सरकार के कार्यकाल में भी उन्होंने आंदोलन किया था, लेकिन स्थायी समाधान नहीं निकल सका।
अब मौजूदा सरकार के सामने भी कर्मचारियों ने अपनी मांगें मजबूती से रखी हैं। उनका कहना है कि सरकार को अब सिर्फ आश्वासन देने के बजाय ऐसा फैसला लेना चाहिए, जिससे वर्षों से सेवाएं दे रहे कर्मचारियों और उनके परिवारों को भविष्य की चिंता से राहत मिल सके।
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सरकार को दो महीने का अल्टीमेटम
चौड़ा मैदान में प्रदर्शन के दौरान आउटसोर्स कर्मचारी संघ ने सरकार के सामने तीन प्रमुख मांगें रखीं और इनके समाधान के लिए दो महीने का समय दिया। कर्मचारियों की प्रमुख मांगों में नौकरी की सुरक्षा, समान काम के लिए समान वेतन और नौकरी के दौरान मृत्यु या दिव्यांगता का शिकार हुए कर्मचारियों के परिवारों को उचित सहायता शामिल है। ऐसे मामलों में परिवार के एक सदस्य को रोजगार देने की मांग भी उठाई गई है। कर्मचारियों ने चेतावनी दी कि यदि दो महीने की निर्धारित अवधि में सरकार ने उनकी मांगों पर सकारात्मक निर्णय नहीं लिया तो आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा।
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अब पीछे हटने वाले नहीं
आउटसोर्स कर्मचारी संघ के कन्वीनर अश्वनी शर्मा ने कहा कि कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर पीछे हटने वाले नहीं हैं। उन्होंने कहा कि सरकार को दो महीने का समय दिया गया है और उम्मीद है कि इस अवधि में कर्मचारियों की समस्याओं का समाधान किया जाएगा। उन्होंने मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू से भी उम्मीद जताई कि सरकार लंबे समय से संघर्ष कर रहे आउटसोर्स कर्मचारियों के हित में सकारात्मक फैसला लेगी। उनका कहना है कि मुख्यमंत्री द्वारा विभिन्न शोषित वर्गों के हित में फैसले लिए जा रहे हैं, इसलिए आउटसोर्स कर्मचारियों को भी सरकार से काफी उम्मीदें हैं।
