कुल्लू। हिमाचल प्रदेश के कुल्लू क्षेत्रीय अस्पताल में एक नवजात बच्ची को जन्म देने के महज 24 घंटे बाद 23 वर्षीय रजनी शर्मा की मौत का मामले ने अब जनआंदोलन का रूप ले लिया है। वहीं इस मामले की चर्चा अब पूरे हिमाचल प्रदेश में हो रही है। एक ओर परिवार अपनी नवजात बेटी के जन्म की खुशियां मना रहा थाए वहीं दूसरी ओर अगले ही दिन मां की मौत ने पूरे परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया।

 

मंडी जिले के सराज क्षेत्र के सुनारू गांव की रहने वाली रजनी शर्मा की मौत के बाद परिजनों ने अस्पताल प्रशासन और चिकित्सकीय व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं। मामले ने इतना तूल पकड़ लिया है कि अस्पताल परिसर में धरना प्रदर्शन शुरू हो गया है, जबकि महिला आयोग सहित जिला प्रशासन के उच्च अधिकारियों तक शिकायत पहुंच चुकी है।

अस्पताल परिसर में आमरण अनशन पर बैठे लोग

आज सोमवार को इस मामले में मृतका के परिजनों और ग्रामीणों ने भारी संख्या में क्षेत्रीय अस्पताल पहुंच कर उग्र प्रदर्शन किया। इस दौरान भीड़ सिक्योरिटी गार्ड्स के साथ धक्का मुक्की कर गेट को जबरन खोलकर अंदर घुस आए। प्रदर्शनकारियों ने अस्पताल परिसर में हिमाचल के स्वास्थ्य मंत्री का पुतला फूंका और प्रदेश सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। लोगों की भीड़ को देखते हुए अस्पताल परिसर में भारी संख्या में पुलिस बल भी तैनात किया गया था। प्रदर्शनकारी अस्पताल परिसर में ही आमरण अनशन पर बैठ गए हैं और उच्च स्तरीय जांच की मांग कर रहे हैं।

 

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नियमित जांच के बाद भी नहीं दी किसी खतरे की जानकारी

परिजनों का आरोप है कि गर्भावस्था के दौरान रजनी का कुल्लू क्षेत्रीय अस्पताल में नियमित उपचार चल रहा था। परिवार के अनुसार करीब दस महीनों में नौ बार प्रसव पूर्व जांच करवाई गई और हर बार उन्हें यही बताया गया कि मां और गर्भस्थ शिशु पूरी तरह स्वस्थ हैं। परिवार का कहना है कि किसी भी चरण में उन्हें किसी गंभीर बीमारी, हाई रिस्क प्रेग्नेंसी या संभावित जटिलता के बारे में जानकारी नहीं दी गई। इसी कारण वे पूरी तरह निश्चिंत थे और निर्धारित समय पर सुरक्षित प्रसव की उम्मीद कर रहे थे।

 

निर्धारित तारीख से पहले ऑपरेशन पर उठे सवाल

परिजनों के अनुसार डॉक्टरों ने प्रसव की संभावित तारीख 7 जुलाई बताई थी। हालांकि 20 जून को अचानक ऑपरेशन कर बच्ची का जन्म करवाया गया। अब परिवार सवाल उठा रहा है कि यदि गर्भावस्था सामान्य थी तो निर्धारित तारीख से करीब 17 दिन पहले ऑपरेशन करने की आवश्यकता क्यों पड़ी। यदि कोई चिकित्सकीय आपात स्थिति थी तो उसके बारे में परिवार को क्यों नहीं बताया गया और यदि ऐसी कोई स्थिति नहीं थी तो फिर समय से पहले ऑपरेशन का निर्णय किन परिस्थितियों में लिया गया।

 

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पीड़िता की चीखों को ड्रामा कह किया नजरअंदाज

परिजनों द्वारा लगाए गए आरोप बेहद अमानवीय और हैरान करने वाले हैं। शिकायत के अनुसार, ऑपरेशन के बाद रजनी की हालत बिगड़ने लगी। वह लगातार असहनीय दर्द, तकलीफ और सांस लेने में दिक्कत की शिकायत कर रही थी। रजनी के पति डॉक्टरों और नर्सों के आगे गिड़गिड़ाते रहे, रोते-बिलखते रहे और यहां तक कि किसी दूसरे अस्पताल रेफर करने की भी भीख मांगी।

 

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परिजनों ने आरोप लगाया कि तड़पती हुई रजनी की तकलीफ को अस्पताल स्टाफ ने ड्रामा करार दिया। नाजुक हालत में भी उसे जबरन और बुरे तरीके से बैठाया गया और उसकी पीठ पर जोर.जोर से हाथ मारकर ड्रामा बंद करने को कहा गया। जब दर्द से बेहाल रजनी ने कहा कि उसे सिर्फ अंधेरा दिखाई दे रहा है, तो स्टाफ ने संवेदनहीनता की हदें पार करते हुए कहा यहां तक कह दिया कि क्या तुम्हें उजाला दिखेगा।

ऑक्सीजन उपलब्ध कराने में देरी का आरोप

शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि जब प्रसूता को सांस लेने में गंभीर दिक्कत होने लगी तो समय रहते आवश्यक ऑक्सीजन सहायता उपलब्ध नहीं करवाई गई। परिजनों का कहना है कि यदि समय पर उचित उपचार मिलता तो शायद उनकी जान बचाई जा सकती थी। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी।

उच्च स्तरीय जांच की मांग

परिवार ने एसडीएम, डीसी और एसपी कुल्लू को लिखित शिकायत देकर पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। शिकायत में ऑपरेशन से संबंधित रिकॉर्ड, मेडिकल दस्तावेज, ड्यूटी रोस्टर, ऑक्सीजन प्रबंधन, सीसीटीवी फुटेज और उपचार प्रक्रिया की विस्तृत जांच करवाने की मांग की गई है। परिजनों का कहना है कि उन्हें केवल यह जानना है कि आखिर एक स्वस्थ बच्ची को जन्म देने वाली महिला की 24 घंटे के भीतर मौत कैसे हो गई।

 

 

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स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे बड़े सवाल

रजनी शर्मा की मौत ने प्रदेश की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर भी कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या मरीजों और उनके परिजनों की शिकायतों को पर्याप्त गंभीरता से लिया जाता है? क्या अस्पतालों में प्रसूता महिलाओं की निगरानी के लिए पर्याप्त व्यवस्था मौजूद है? या फिर यह एक दुर्भाग्यपूर्ण चिकित्सकीय जटिलता थी, जिसे अब लापरवाही का रूप दिया जा रहा है? इन सभी सवालों के जवाब अब प्रस्तावित जांच रिपोर्ट से मिलने की उम्मीद है।

 

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निष्पक्ष जांच पर टिकी सबकी नजरें

फिलहाल पूरे मामले में लोगों की नजरें जांच पर टिकी हुई हैं। आम लोगों, सामाजिक संगठनों और महिला आयोग ने भी मामले की पारदर्शी जांच की मांग की है। लोगों का मानना है कि यदि किसी स्तर पर लापरवाही हुई है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, जबकि यदि आरोप निराधार हैं तो जांच के माध्यम से सच्चाई भी सामने आनी चाहिए। यह मामला केवल एक परिवार के दुख तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि उस भरोसे से भी जुड़ गया है जिसके साथ प्रदेश के हजारों लोग सरकारी अस्पतालों में उपचार के लिए पहुंचते हैं।

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