शिमला। हिमाचल प्रदेश की राजनीति में मंगलवार सुबह एक बड़े घटनाक्रम ने रामपुर विधानसभा क्षेत्र का सियासी समीकरण बदल दिया। रामपुर से लगातार चार बार कांग्रेस विधायक रहे नंद लाल का 72 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने सुबह करीब साढ़े पांच बजे शिमला के चमियाना स्थित अटल सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में अंतिम सांस ली। नंद लाल के निधन के साथ ही रामपुर विधानसभा सीट खाली हो गई है और अब यहां उपचुनाव की संभावना बन गई है।
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले रामपुर में होने वाला यह उपचुनाव कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई साबित हो सकता है। खासकर भाजपा के लिए यह किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगा, क्योंकि रामपुर विधानसभा सीट पर आज तक भाजपा अपना खाता नहीं खोल पाई है। वहीं, लगातार चार चुनाव जीतने वाले नंद लाल के बाद कांग्रेस के सामने अपने इस परंपरागत राजनीतिक गढ़ को बचाए रखने की चुनौती होगी।
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नंद लाल के निधन से खाली हुई रामपुर सीट
रामपुर विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले नंद लाल के निधन के बाद अब इस सीट पर नए विधायक के चुनाव का रास्ता खुल गया है। नंद लाल वर्ष 2007, 2012, 2017 और 2022 में लगातार चार बार कांग्रेस के टिकट पर विधायक चुने गए थे। उनके निधन से विधानसभा में एक सीट रिक्त हो गई है। विधानसभा सचिवालय की ओर से विधायक के निधन की सूचना निर्वाचन आयोग को भेजी जानी है। इसके बाद चुनाव आयोग उपचुनाव करवाने को लेकर आवश्यक प्रक्रिया शुरू करेगा। ऐसे में आने वाले महीनों में रामपुर की राजनीति में चुनावी हलचल तेज होना तय माना जा रहा है।
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छह महीने के भीतर उपचुनाव करवाने का प्रावधान
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 151A के तहत विधानसभा की रिक्त सीट पर सामान्य तौर पर छह महीने के भीतर उपचुनाव करवाने का प्रावधान है। यह नियम तब लागू होता है, जब विधानसभा के शेष कार्यकाल में कम से कम एक वर्ष का समय बचा हो। हिमाचल प्रदेश की 14वीं विधानसभा का कार्यकाल दिसंबर 2027 तक है। ऐसे में अभी विधानसभा चुनावों को एक साल और डेढ़ महीने के करीब का समय है। ऐसे में चुनाव आयोग यह फैसला लेगा, कि रामपुर में उपचुनाव होंगे या नहीं। मुख्य निर्वाचन अधिकारी जल्द ही चुनाव आयोग को रिक्त सीट के संबंध में जानकारी भेजेंगे। अंतिम निर्णय चुनाव आयोग की ओर से लिया जाएगा।
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रामपुर में आज तक नहीं खिला भाजपा का कमल
रामपुर विधानसभा क्षेत्र लंबे समय से कांग्रेस का मजबूत राजनीतिक गढ़ रहा है। यहां अब तक भाजपा विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज नहीं कर पाई है। वर्ष 1977 में कांग्रेस को जनता दल के प्रत्याशी निनजू राम के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। इसके बाद अधिकांश चुनावों में कांग्रेस ने अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखी। यही वजह है कि अब होने वाले संभावित उपचुनाव में भाजपा के सामने इतिहास बदलने की चुनौती होगी। पार्टी के लिए यह केवल एक विधानसभा सीट जीतने का मौका नहीं, बल्कि रामपुर में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की परीक्षा भी होगी।
2022 में महज 567 वोट से हारे थे भाजपा प्रत्याशी
रामपुर में कांग्रेस का दबदबा जरूर रहा है, लेकिन वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में मुकाबला बेहद करीबी हो गया था। उस चुनाव में कांग्रेस के नंद लाल ने भाजपा प्रत्याशी कौल सिंह नेगी को महज 567 मतों के अंतर से हराया था। बेहद कम अंतर से मिली जीत ने यह संकेत दिया था कि रामपुर में भाजपा का जनाधार बढ़ रहा है और मुकाबला अब एकतरफा नहीं रह गया है। ऐसे में उपचुनाव में भाजपा इस करीबी मुकाबले को जीत में बदलने की कोशिश करेगी, जबकि कांग्रेस अपने पुराने जनाधार और नंद लाल की राजनीतिक विरासत के सहारे चुनावी मैदान में उतरेगी।
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कांग्रेस के सामने नंद लाल का विकल्प तलाशने की चुनौती
लगातार चार बार विधायक रहे नंद लाल का रामपुर में अपना राजनीतिक आधार था। क्षेत्र में उनकी पहचान एक अनुभवी जनप्रतिनिधि के रूप में रही। उनके निधन के बाद कांग्रेस को अब ऐसे चेहरे की तलाश करनी होगी, जो पार्टी के परंपरागत वोट बैंक को एकजुट रख सके और नंद लाल की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा सके। पार्टी के लिए चुनौती केवल उम्मीदवार तय करने तक सीमित नहीं होगी, बल्कि रामपुर में अपने संगठन और जनाधार को बनाए रखने की भी होगी। दूसरी तरफ भाजपा के पास इस बार रामपुर में राजनीतिक बदलाव का संदेश देने का अवसर रहेगा।
14वीं विधानसभा के कार्यकाल में होगा 10वां उपचुनाव
हिमाचल प्रदेश की 14वीं विधानसभा के कार्यकाल में रामपुर उपचुनाव हुआ तो यह दसवां उपचुनाव होगा। इससे पहले वर्ष 2024 में राज्यसभा चुनाव के बाद पैदा हुए राजनीतिक संकट के चलते प्रदेश की नौ विधानसभा सीटों पर उपचुनाव करवाए गए थे। कांग्रेस के छह विधायकों ने राज्यसभा चुनाव में पार्टी प्रत्याशी के खिलाफ क्रॉस वोटिंग की थी। बाद में विधानसभा अध्यक्ष कुलदीप सिंह पठानिया ने उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया था। इसके अतिरिक्त तीन निर्दलीय विधायकों ने भी विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दिया था। इसके बाद धर्मशाला, सुजानपुर, लाहौल-स्पीति, बड़सर, गगरेट, कुटलैहड़, नालागढ़, हमीरपुर और देहरा में उपचुनाव हुए थे। इन नौ सीटों में कांग्रेस ने छह और भाजपा ने तीन सीटों पर जीत दर्ज की थी। हालांकि रामपुर में उपचुनाव की वजह राजनीतिक बगावत नहीं, बल्कि मौजूदा विधायक का निधन है।
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सरकार के बहुमत पर नहीं पड़ेगा उपचुनाव का असर
रामपुर उपचुनाव के नतीजे का प्रदेश की मौजूदा सरकार के बहुमत पर सीधा असर पड़ने की संभावना नहीं है। नंद लाल के निधन के बाद भी विधानसभा में कांग्रेस के पास 39 विधायक और भाजपा के पास 28 विधायक बताए जा रहे हैं। ऐसे में इस एक सीट का परिणाम सरकार के अस्तित्व के लिए निर्णायक नहीं होगा। इसके बावजूद राजनीतिक दृष्टि से यह चुनाव बेहद अहम रहेगा, क्योंकि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मतदाताओं के रुख का एक संकेत मिल सकता है। दोनों प्रमुख दल इस चुनाव को अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने के अवसर के रूप में देखेंगे।
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2027 से पहले सत्ता का सेमीफाइनल बनेगा रामपुर उपचुनाव
हिमाचल प्रदेश में अगला विधानसभा चुनाव दिसंबर 2027 में होना प्रस्तावित है। उससे पहले रामपुर में होने वाला उपचुनाव प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखेगा। कांग्रेस के लिए यह अपने परंपरागत गढ़ को बचाने की चुनौती होगी, जबकि भाजपा के सामने पहली बार रामपुर में जीत दर्ज कर इतिहास बदलने का अवसर रहेगा। वर्ष 2022 में महज 567 वोटों से मिली हार के बाद भाजपा इस बार पूरी ताकत लगा सकती है। ऐसे में रामपुर का चुनाव केवल एक विधायक चुनने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस और भाजपा के जनाधार, संगठनात्मक ताकत और चुनावी रणनीति की भी परीक्षा लेगा। इसी वजह से रामपुर की इस सीट पर होने वाले उपचुनाव को प्रदेश की राजनीति का सत्ता का सेमीफाइनल माना जा रहा है।
