शिमला। हिमाचल प्रदेश में नगर निकाय चुनावों का बिगुल बजते ही सियासी तापमान तेजी से चढ़ने लगा है। चार नगर निगमों सोलन, धर्मशाला, मंडी और पालमपुर में होने वाले चुनाव अब सिर्फ स्थानीय निकाय तक सीमित नहीं रहे, बल्कि इन्हें 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले का “सेमीफाइनल” माना जा रहा है। यही वजह है कि दोनों प्रमुख दल कांग्रेस और भाजपा पूरी ताकत के साथ मैदान में उतर चुके हैं।

भाजपा के बाद कांग्रेस ने उतारे अपने सिपाही

दो दिन पहले ही भाजपा ने अपने चुनावी मोर्चे को मजबूत करते हुए चारों नगर निगमों के लिए प्रभारी और टीमों की घोषणा कर दी थी। अब सत्तारूढ़ कांग्रेस ने भी देरी न करते हुए अपने सियासी सिपाहियों को मैदान में उतार दिया है। कांग्रेस ने अपने रणनीतिकारों और तेज-तर्रार नेताओं को अहम जिम्मेदारियां सौंपकर साफ संकेत दे दिया है कि वह इस चुनाव को हल्के में लेने के मूड में नहीं है।

 

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जयराम के गढ़ में सेंध लगाएंगे विक्रमादित्य

कांग्रेस ने नेता प्रतिपक्ष जयराम के गृह जिला में सेंध लगाने के लिए अपने तेज तर्रार नेता विक्रमादित्य सिंह को कमान सौंपी है। विक्रमादित्य सिंह मंडी नगर निगम का मोर्चा संभालेंगे।  खास बात यह है कि मंडी को नेता प्रतिपक्ष का गढ़ माना जाता है, ऐसे में यहां विक्रमादित्य सिंह की तैनाती को सियासी रूप से बड़ा दांव माना जा रहा है।

 

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इसी तरह से सोलन नगर निगम की जिम्मेदारी शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर को सौंपी है। वहीं पालमपुर में तकनीकी शिक्षा मंत्री राजेश धर्माणी को जिम्मेदारी दी गई है, जबकि धर्मशाला नगर निगम के लिए हिमाचल पर्यटन विकास निगम के चेयरमैन आरएस बाली को प्रभारी बनाया गया है।

भाजपा पहले ही बना चुकी है रणनीति

भाजपा ने भी चुनावी मोर्चे पर पहले ही अपनी टीमों की घोषणा कर दी है और मिशन मोड में चुनाव लड़ने का संकेत दे दिया है। पार्टी ने हर नगर निगम के लिए अलग-अलग नेताओं की टीम तैयार की है, जो बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करने में जुट गई है।

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दोनों दलों की साख दांव पर

इन चुनावों में मुकाबला सीधा और तीखा होने वाला है, क्योंकि नगर निगम चुनाव पार्टी चिन्ह पर होते हैं। ऐसे में यह कांग्रेस सरकार के लिए कामकाज का रिपोर्ट कार्ड साबित होंगे, तो भाजपा के लिए सरकार के खिलाफ माहौल बनाने का बड़ा अवसर।

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हर सीट बनेगी प्रतिष्ठा की जंग

17 मई को मतदान और 31 मई को नतीजों के साथ यह साफ हो जाएगा कि जनता का झुकाव किस ओर है। फिलहाल दोनों ही दल रणनीति, समीकरण और संगठनात्मक मजबूती के दम पर जीत का दावा कर रहे हैं। कुल मिलाकर, हिमाचल में निकाय चुनाव अब पूरी तरह से सियासी रण में बदल चुके हैं, जहां हर वार्ड और हर वोट सत्ता की अगली तस्वीर तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।

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