शिमला। हमारे जीवन में कुछ जगहें ऐसी होती हैं, जिनसे इंसान कितना भी दूर चला जाए, उनका रिश्ता कभी खत्म नहीं हातो। शिमला जिला के ठियोग के केल्वी स्कूल से देवीराम शर्मा जी का रिश्ता भी कुछ ऐसा ही है। करीब छह दशक पहले जिस स्कूल में उन्होंने छात्र के तौर पर कदम रखा था, अब उसी स्कूल को उन्होंने गोद लिया है।
68 वर्षीय देवीराम ने स्कूल को लिया गोद
68 वर्षीय देवीराम शर्मा ने सीनियर सेकेंडरी स्कूल केल्वी को गोद लिया है। एसडीएम ठियोग के रीडर पद से सेवानिवृत्त देवीराम ने ‘माय स्कूल माय प्राइड’ कार्यक्रम के तहत यह जिम्मेदारी उठाई है। स्कूल में उनके पहुंचने पर शिक्षकों और विद्यार्थियों ने उनका स्वागत किया। इस दौरान उन्होंने अपने छात्र जीवन से जुड़ी कई यादें भी साझा कीं।
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इसी स्कूल से पढ़े हैं देवीराम शर्मा
देवीराम शर्मा के लिए यह सिर्फ स्कूल को गोद लेने का फैसला नहीं है, बल्कि अपने अतीत से दोबारा जुड़ने जैसा है। उन्होंने बताया कि वह 1962 से 1967 तक केल्वी स्कूल में पढ़े थे।
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उन्हें आज भी वह दिन याद है, जब पांचवीं कक्षा में पूरे ब्लॉक में पहला स्थान हासिल करने पर उनके शिक्षक ने खुशी में उन्हें कंधे पर उठा लिया था। उन्होंने बताया कि आगे की पढ़ाई के दौरान भी उन्होंने कई मुश्किलें देखीं। आठवीं कक्षा में गड़कुफरी स्कूल में उनके छह साथियों में से पांच परीक्षा में असफल रहे, जबकि वह अकेले सफल हुए थे।
अपने पैसों से मिड-डे मिल देंगे देवीराम
स्कूल को गोद लेने के बाद देवीराम शर्मा और उनकी पत्नी केसरी शर्मा ने विद्यार्थियों के लिए बड़ा संकल्प लिया है। उन्होंने कक्षा 9वीं से 12वीं तक पढ़ने वाले 93 बच्चों के साथ स्कूल स्टाफ के लिए अपनी ओर से रोजाना दोपहर के भोजन की व्यवस्था आजीवन करने का वादा किया है।
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इसके अलावा उन्होंने स्कूल को 20 हजार रुपये की स्वैच्छिक सहायता भी दी। उनका कहना है कि भविष्य में स्कूल को जिस तरह की जरूरत होगी, उसके मुताबिक वह मदद करते रहेंगे। देवीराम शर्मा ने कहा कि जिस स्कूल और मिट्टी ने उन्हें आगे बढ़ने का रास्ता दिया, उसके लिए उनका यह योगदान बहुत छोटा है।
संघर्ष से बनाई अपनी पहचान
देवीराम शर्मा की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। आर्थिक मुश्किलों के बीच उन्होंने बिजली बोर्ड में महज 4.25 रुपये रोज की दिहाड़ी पर काम किया। दिन में नौकरी और शाम को पढ़ाई और इसी तरह उन्होंने अपना सफर आगे बढ़ाया।
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बाद में उन्होंने बीए ऑनर्स किया और बिजली विभाग में नियमित नौकरी मिलने के बावजूद अलग राह चुनते हुए जिला प्रशासनिक सेवा में काम शुरू किया।
पढ़ाई का सिलसिला भी जारी रखा। उन्होंने हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से MA इंग्लिश, MA लोक प्रशासन और MA इकोनॉमिक्स की डिग्री हासिल की।
तीन बार पास की HAS परीक्षा
उन्होंने तीन बार HAS की लिखित परीक्षा पास की, हालांकि इंटरव्यू में चयन नहीं हो पाया। इसके बाद भी उन्होंने कोशिशें जारी रखीं और कुरुक्षेत्र से कानून की पढ़ाई करने के साथ IGNOU से पत्रकारिता की डिग्री भी हासिल की। साल 2016 में वह SDM ठियोग के रीडर पद से सेवानिवृत्त हुए।
स्कूल को गोद लेने से बढ़ेगी सुविधाओं की उम्मीद
स्कूल के प्रधानाचार्य डॉ. रमेश वर्मा ने कहा कि पुराने छात्र का दोबारा स्कूल से जुड़ना विद्यार्थियों और संस्थान दोनों के लिए सकारात्मक है। स्कूल प्रबंधन को उम्मीद है कि इससे जरूरी संसाधनों की कमी दूर करने के साथ-साथ विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाने में भी मदद मिलेगी। स्कूल मैनेजमेंट कमेटी के अध्यक्ष मुकेश वर्मा ने भी इसे पूरे क्षेत्र के लिए गर्व का विषय बताया।
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क्या है ‘माय स्कूल माय प्राइड’?
प्रदेश सरकार ने जनवरी 2024 में ‘माय स्कूल माय प्राइड’ कार्यक्रम शुरू किया था। इसका उद्देश्य सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाने के लिए समाज के लोगों, जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों को उनसे जोड़ना है।
इस पहल के तहत स्कूलों को गोद लेने वाले लोग शिक्षा, आधारभूत सुविधाओं और दूसरी जरूरतों में सहयोग कर सकते हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, प्रदेश में अब तक 6,080 सरकारी स्कूल गोद लिए जा चुके हैं।
