मंडी। हिमाचल प्रदेश के मंडी नगर निगम चुनाव के सबसे चर्चित मुकाबलों में शामिल खलियार वार्ड ने ऐसा परिणाम दिया है जिसने कांग्रेस और भाजपा दोनों की राजनीतिक रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मंडी नगर निगम चुनाव में खेला
कांग्रेस ने जिस नेता पर भरोसा जताया, वह चुनाव हार गया और भाजपा जिस सीट पर जीत की उम्मीद लगाए बैठी थी, वहां भी उसे निराशा हाथ लगी। आखिरकार जीत उस प्रत्याशी के हिस्से में गई, जिसे कांग्रेस ने टिकट देने से इनकार कर दिया था।
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अलकनंदा ने दर्ज की शानदार जीत
खलियार वार्ड से निर्दलीय उम्मीदवार अलकनंदा ने शानदार जीत दर्ज कर न सिर्फ कांग्रेस नेतृत्व को बड़ा राजनीतिक संदेश दिया, बल्कि भाजपा की चुनावी गणना भी पूरी तरह बिगाड़ दी। इस नतीजे ने साफ कर दिया कि स्थानीय राजनीति में जनता ने दलों से ज्यादा व्यक्ति और काम को प्राथमिकता दी है।
टिकट कटने के बाद बागी बनीं
खलियार वार्ड में कांग्रेस के भीतर टिकट वितरण को लेकर शुरू हुआ विवाद आखिरकार चुनाव परिणाम में भी दिखाई दिया। कांग्रेस ने चार बार की पार्षद और क्षेत्र में मजबूत पकड़ रखने वाली अलकनंदा का टिकट काटकर वरिष्ठ कांग्रेस नेता कौल सिंह ठाकुर के भतीजे प्रवीण कुमार ठाकुर को उम्मीदवार बनाया था।
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फिर जीतकर लौटीं
टिकट कटने से नाराज अलकनंदा ने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने स्थानीय मुद्दों और अपने पिछले कार्यकाल के कामकाज को प्रमुखता से उठाया। मतदाताओं ने भी उनके पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें विजयी बना दिया।
कांग्रेस उम्मीदवार और भाजपा के दिग्गज दोनों हारे
इस सीट पर मुकाबला त्रिकोणीय था। एक ओर कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी प्रवीण कुमार ठाकुर थे तो दूसरी ओर भाजपा के पूर्व जिला अध्यक्ष रणबीर सिंह मैदान में थे, जिन्हें नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर का करीबी माना जाता है।
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दोनों दलों को झटका
मगर नतीजा दोनों दलों के लिए झटके वाला रहा। कांग्रेस का आधिकारिक उम्मीदवार भी हार गया और भाजपा का वरिष्ठ चेहरा भी जीत नहीं सका। ऐसे में यह परिणाम दोनों प्रमुख दलों के लिए आत्ममंथन का विषय बन गया है।
खलियार बना चुनाव का सबसे चर्चित वार्ड
मंडी नगर निगम चुनाव में खलियार वार्ड का परिणाम सबसे अधिक चर्चा में है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह नतीजा केवल एक वार्ड की जीत-हार नहीं, बल्कि टिकट वितरण, स्थानीय नेतृत्व और संगठनात्मक फैसलों पर जनता की प्रतिक्रिया भी है।
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अलकनंदा की जीत ने यह संदेश दिया है कि स्थानीय स्तर पर मजबूत जनाधार रखने वाले नेताओं को नजरअंदाज करना किसी भी राजनीतिक दल को भारी पड़ सकता है।
