सिरमौर। हिमाचल प्रदेश की ऐसी परियोजना जो पिछले 60 साल से अटकी हुई थी। उस पर बीते मंगलवार को दिल्ली में 6 राज्य के साथ CM सुक्खू ने MoU साइन कर मुहर लगा दी। एक तरफ बड़ी परियोजना के निर्माण से बिजली, रोजगार और आर्थिक गतिविधियों की उम्मीद है।
झील बनी तो डूब जाएंगे 21 गांव
दूसरी तरफ उन गांवों में बैचैनी बढ़ रही है- जहां लोगों को अपना घर-बार छोड़ने की आशंका सता रही है। टौंस नदी पर प्रस्तावित किशाऊ बांध परियोजना को लेकर समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर के बाद जिला सिरमौर के शिलाई उपमंडल के प्रभावित इलाकों में अब विकास के साथ विस्थापन की चर्चा भी तेज हो गई है।
यह भी पढ़ें : हिमाचल में BJP विधायक के बयान से सियासी हलचल, बोले- सांसदों में दम नहीं; CM को सराहा
कौन-कौन से गांव को खतरा?
परियोजना के प्रस्तावित जलाशय से शिलाई क्षेत्र के सात राजस्व गांव और 14 उपगांव प्रभावित होने की जानकारी सामने आई है। इनमें मोहराड़, मश्वाड़, कुसेनु, डूडोग, चाकरी नेरा, सियासु, मिनस, जिलूर, सांग और जामली समते कई क्षेत्र शामिल बताए जा रहे हैं। वहीं, उत्तराखंड के जौनसार-बावर क्षेत्र के शम्भर-मेलोथ, मझगांव, कोटा, बोहग, सेंज, पाटन, मिनस और रामढूंगा सहित अन्य इलाके भी प्रस्तावित जलाशय की जद में आने की बात कही जा रही है।
ग्रामीणों को सता रहा विस्थापन का डर
परियोजना के तरह प्रभावित परिवारों के लिए भूमि, अधिग्रहण, मुआवजे और पुनर्वास की व्यवस्था की जानी है। मगर ग्रामीणों के लिए मामला सिर्फ जमीन के बदले मिलने वाली रकम तक सीमित नहीं है। ग्रामीणों के लिए जमीन नहीं, पूरी पीढ़ियों की कहानी है।
यह भी पढ़ें- हिमाचल : लड़कियों को बहला-फुसलाकर होटल ले गया शख्स, की गंदी हरकतें- केस दर्ज
परिवारों की पहचान है पुश्तैनी जमीन
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि उनकी पुश्तैनी जमीन उनके परिवारों की पहचान का हिस्सा है। इन्हीं घरों में कई पीढ़ियां बड़ी हुईं। इन्हीं खेतों में परिवारों ने मेहनत की। गांव की पगडंडियां केवल आने-जाने के रास्ते नहीं, बल्कि बचपन और रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा रही हैं।
अस्तित्व का भी खतरा
ग्रमीणों में चिंता है कि जलाशय बनने के बाद अगर ये क्षेत्र डूब क्षेत्र में आते हैं तो आने वाली पीढ़ियों का अपने मूल गांव से रिश्ता सिर्फ यादों, तस्वीरों और बुजुर्गों की कहानियों तक सिमट सकता है।
यह भी पढ़ें- सितंबर में हिमाचल सफेद : कई जिलों में बर्फबारी, तूफान और तेज बारिश ने डराए लोग
कई पीढ़ियों ने बिताया जीवन
विस्थापन की चिंता सिर्फ मकान छूटने की नहीं है। गांव के साथ लोगों की खेती, आजीविका, रिश्तेदारी, सामाजिक मेल-जोल और स्थानीय जीवनशैली जुड़ी हुई है। एक परिवार के लिए नया मकान बनाना संभव हो सकता है। मगर वह जगह दोबारा बनाना आसान नहीं जहां परिवार की कई पीढ़ियों ने जीवन बिताया हो।
देवस्थलों को लेकर भी चिंता
प्रभावित क्षेत्रों में कई स्थानीय देवस्थल और पूजा स्थल ग्रामीणों की आस्था से जुड़े हुए हैं। इन स्थानों पर वर्षों से धार्मिक परंपराएं और स्थानीय रीति-रिवाज निभाए जाते रहे हैं। ऐसे में जलाशय बनने की स्थिति में इन स्थलों के प्रभावित होने की आशंका भी ग्रामीणों के लिए बड़ा मुद्दा है। उनका कहना है कि गांव छोड़ने का अर्थ केवल घर और जमीन छोड़ना नहीं होगा, बल्कि उन स्थानों से भी दूरी बन जाएगी जिनसे उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान जुड़ी हुई है।
यह भी पढ़ें- त्योहारी सीजन में हिमाचलियों को राहत- राशन डिपुओं में पहले से ज्यादा मिलेगा आटा, जानें
किशाऊ नाम पर भी उठ चुके हैं सवाल
परियोजना को लेकर केवल विस्थापन ही चर्चा का विषय नहीं है। जौनसार-बावर क्षेत्र में परियोजना के नाम को लेकर भी आपत्ति सामने आ चुकी है। किशाऊ बांध संघर्ष समिति की बैठक में संरक्षक मुन्ना सिंह राणा और अध्यक्ष मातवर सिंह तोमर की अध्यक्षता में परियोजना के नामकरण पर सवाल उठाए गए थे।
बांध से 15 KM दूर है गांव
समिति का तर्क है कि किशाऊ गांव प्रस्तावित बांध स्थल से करीब 15 किलोमीटर दूर है और वहां की जमीन परियोजना में शामिल नहीं हो रही है। समिति के अनुसार प्रस्तावित बांध क्षेत्र चकराता तहसील के शम्भर-मेलोथ इलाके में आता है। ऐसे में समिति ने परियोजना का नाम क्षेत्र की भौगोलिक और सांस्कृतिक पहचान के अनुरूप रखने की मांग की है।
यह भी पढ़ें- हिमाचल में मर्ड**र : भाई-भाभी ने झील में फेंकी देह, लापता होने का रचा नाटक- 4 दिन बाद खुला राज
दशकों पुरानी है किशाऊ परियोजना
बता दें कि किशाऊ परियोजना का इतिहास काफी पुराना है। वर्ष 1940 के दशक में इस क्षेत्र में बांध निर्माण की संभावानाओं को लेकर शुरुआती वैज्ञानिक जांच शुरू हुई थी। पहाड़ों की संरचना और भूगर्भीय स्थिति को समझने के लिए भूमिगत सुरंगों और ड्रिलिंग के जरिए परीक्षण किए गए।
बांध निर्माण के लिए सही नहीं...
बाद के वर्षों में परियोजना से जुड़े तकनीकी और भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण जारी रहे। बताया जाता है कि 1960 के दशक में आई वैज्ञानिक रिपोर्टों में मूल किशाऊ स्थल को बांध निर्माण के लिए उपयुक्त नहीं माना गया था। इसके बाद प्रस्तावित क्षेत्र को शम्भर-मेलोथ और चामड़ा-मोहराड़ की ओर स्थानांतरित किया गया।
यह भी पढ़ें- हिमाचल में मौसम बदलाव : कई इलाकों में सुबह-सुबह छाया अंधेरा, 6 जिलों में बारिश
दशकों की कवायद, अब समझौता
दशकों की कवायद के बाद अब समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर होने से परियोजना एक नए चरण में पहुंच गई है। ऐसे में आने वाले समय में सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि विकास से मिलने वाले लाभों के साथ प्रभावित परिवारों के अधिकार, आजीविका और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण किस तरह सुनिश्चित किया जाता है।
