रिकांगपिओ। हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले के प्रमुख पर्यटन स्थल सांगला में एक प्राकृतिक झील अब बड़े खतरे की वजह बनती जा रही है। सांगला के देबार कंडा में स्थित यारपाबंग झील का दायरा लगातार बढ़ने से क्षेत्र में भारी बाढ़ और भूस्खलन की आशंका जताई जा रही है।
DC से मिले ग्रामीण
संभावित खतरे को देखते हुए शनिवार को सांगला पंचायत के प्रधान प्रविंद्र नेगी की अगुवाई में प्रतिनिधिमंडल ने उपायुक्त किन्नौर डॉ. अमित कुमार शर्मा को ज्ञापन सौंपा। पंचायत ने प्रशासन से झील की तत्काल स्थिति का जायजा लेने और संवेदनशील क्षेत्रों में अर्ली वॉर्निंग सिस्टम स्थापित करने की मांग की है।
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2024 के बाद नहीं हुआ कोई ठोस काम
पंचायत प्रधान प्रविंद्र नेगी के अनुसार, 2024 में सेना, ITBP, CTOC, जिला प्रशासन और भू-वैज्ञानिकों की संयुक्त टीम ने यारपाबंग झील का निरीक्षण किया था। उस दौरान झील की लंबाई करीब 550 मीटर, चौड़ाई 260 मीटर और गहराई 28 मीटर मापी गई थी।
टीम ने झील से पानी और ग्लेशियर के सैंपल भी लिए थे। हालांकि पंचायत का आरोप है कि निरीक्षण के बाद सुरक्षा की दृष्टि से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
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नेपाल त्रासदी के बाद डरे लोग
नेपाल में हालिया भीषण बाढ़ के बाद सांगला घाटी के लोगों की चिंता और बढ़ गई है। लोगों को आशंका है कि भूकंप या ग्लेशियर पिघलने से झील टूटती है तो बास्पा और सतलुज नदी में अचानक बाढ़ आ सकती है।
सांगला से कड़छम तक 18 किमी क्षेत्र खतरे में
पंचायत के मुताबिक, अगर प्राकृतिक झील टूटती है तो सांगला से कड़छम तक करीब 18 किलोमीटर का क्षेत्र इसकी चपेट में आ सकता है। संभावित बाढ़ से हुरबा, केदारचो, छिदो सारिंग, चांग सारिंग, रुतरंग, जरयो सारिंग, शौंग, कुप्पा और बुआ समेत निचले इलाकों में भारी नुकसान की आशंका है।
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चपेट में आ सकती है कई परियोजनाएं
खतरा सिर्फ गांवों तक सीमित नहीं है। संभावित तबाही की चपेट में 300 मेगावाट की बास्पा-2 और 1,000 मेगावाट की कड़छम-वांगतू जलविद्युत परियोजनाएं भी आ सकती हैं। इससे जानमाल के साथ-साथ करोड़ों रुपये की संपत्ति और बुनियादी ढांचे को नुकसान होने की आशंका है।
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ड्रोन से 24 घंटे निगरानी की मांग
संभावित खतरे को देखते हुए पंचायत ने प्रशासन के सामने कई मांगें रखी हैं। इनमें शामिल हैं:
- भू-वैज्ञानिकों, सेना, ITBP और SDMA की टीम से तत्काल दोबारा निरीक्षण करवाना।
- देबार कंडा और निचले गांवों में अर्ली वॉर्निंग सिस्टम लगाना।
- सांगला घाटी के लिए आपदा प्रबंधन और निकासी योजना तैयार करना।
- सैटेलाइट या ड्रोन के जरिए झील की 24 घंटे निगरानी करना।
- तकनीकी रूप से संभव होने पर झील से पानी की नियंत्रित निकासी कर जलस्तर कम करना।
पंचायत का कहना है कि खतरा बढ़ने से पहले निगरानी और चेतावनी की व्यवस्था तैयार करना जरूरी है, ताकि किसी भी आपात स्थिति में लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सके।
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