चंबा। आस्था जब दिल में हो तो मुश्किल रास्ते भी आसान लगने लगते हैं। जम्मू-कश्मीर के भद्रवाह और आसपास के क्षेत्रों से निकले शिवभक्त इसका जीता-जागता उदाहरण बने हुए हैं। मणिमहेश कैलाश के दर्शन के लिए श्रद्धालु नंगे पांव लंबी पहाड़ी यात्रा पर निकले हैं। चंबा से होते हुए भरमौर की ओर बढ़ रहे इन श्रद्धालुओं के कदम भले ही पथरीले रास्तों पर पड़ रहे हों, लेकिन उनके उत्साह में कोई कमी नहीं दिख रही।
भद्रवाह से पारंपरिक वेशभूषा के साथ निकले भक्त
इस पदयात्रा में सिर्फ धार्मिक आस्था ही नजर नहीं आ रही, बल्कि भद्रवाह की समृद्ध लोक संस्कृति भी साथ-साथ चल रही है। श्रद्धालु पारंपरिक वेशभूषा में लोक वाद्य यंत्रों की धुन पर भजन-कीर्तन करते हुए आगे बढ़ रहे हैं। रास्ते में लगातार ‘हर-हर महादेव’ और भगवान शिव के जयकारे गूंज रहे हैं।
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नंगे पांव सफर, फिर भी कदम नहीं रुके
मणिमहेश की राह आसान नहीं है। लंबी दूरी, ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी रास्ते और चढ़ाई के बीच नंगे पांव चलना अपने आप में बड़ी चुनौती है। इसके बावजूद श्रद्धालुओं के कदम लगातार कैलाश की ओर बढ़ रहे हैं।
कई KM पैदल चल करेंगे दर्शन
कई श्रद्धालु यात्रा के लिए जरूरी सामान भी अपने साथ लेकर पैदल ही सफर कर रहे हैं। उनके लिए यह सिर्फ एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा और भगवान शिव के प्रति अटूट विश्वास का हिस्सा है। भक्ति गीतों और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन के बीच जब ‘हर-हर महादेव’ के जयकारे लगते हैं तो पूरा यात्रा मार्ग भक्तिमय नजर आता है।
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श्रद्धालुओं का खास स्वागत करेगा भरमौर प्रशासन
इस बार मणिमहेश यात्रा में भद्रवाह क्षेत्र से पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के लिए एक और खास पहल की जा रही है। भरमौर प्रशासन पहली बार भद्रवाह और आसपास के इलाकों से आने वाले श्रद्धालुओं की छड़ी का विशेष स्वागत करेगा।
बैंड-बाजे के साथ जाने की योजना
प्रशासन की ओर से छड़ी का स्वागत फूलमालाओं और बैंड-बाजे के साथ किए जाने की योजना है। इसके जरिए जम्मू-कश्मीर से आने वाले श्रद्धालुओं की धार्मिक आस्था के साथ उनकी लोक परंपरा का भी सम्मान किया जाएगा।
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आस्था के आगे छोटी पहाड़ी की कठिन चढ़ाई
भद्रवाह से मणिमहेश तक इन श्रद्धालुओं की यात्रा इस बात की तस्वीर पेश कर रही है कि पहाड़ की कठिन चढ़ाई भी उस आस्था के आगे छोटी पड़ जाती है- जो वर्षों से भगवान शिव के प्रति लोगों के मन में बनी हुई है।
