शिमला। हिमाचल प्रदेश के सबसे बड़े स्वास्थ्य संस्थानों में शामिल IGMC में डॉक्टरों की सूझबूझ और अनुभव ने बड़ी सफलता हासिल की है। यहां एक पांच वर्षीय मासूम बच्चे की आंखों की रोशनी बचाकर मिसाल पेश की है।
बच्चे की आंख में घुसी लकड़ी
सिरमौर जिले के राजगढ़ क्षेत्र से जुड़े इस मामले में बच्चा करीब 10 फुट ऊंचाई से गिर गया था। हादसा इतना गंभीर था कि गिरने के दौरान एक नुकीला लकड़ी का टुकड़ा उसकी दाहिनी आंख के ऑर्बिट यानी आंख के आसपास की हड्डी वाले हिस्से में गहराई तक जा घुसा।
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जा सकती थी आंखों की रोशनी
स्थिति बेहद नाजुक थी और थोड़ी सी देरी या लापरवाही बच्चे की आंख की रोशनी हमेशा के लिए छीन सकती थी। घटना के बाद परिजन घायल बच्चे को तुरंत IGMC के आपातकालीन विभाग लेकर पहुंचे- जहां 24 अप्रैल को उसे भर्ती किया गया।
टेस्ट में क्या आया सामने?
अगले दिन बच्चे की स्थिति को देखते हुए मैक्सिलोफेशियल OPD में विस्तृत जांच की गई। डाक्टरों ने CT स्कैन भी कराया। मगर रिपोर्ट में केवल ऑर्बिटल एम्फिसिमा दिखाई दिया। सबसे बड़ी चुनौती यह रही कि आंख में घुसा लकड़ी का टुकड़ा स्कैन में स्पष्ट नजर ही नहीं आया।
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लकड़ी का टुकड़ा कैसे निकला?
डॉक्टरों के अनुसार, सूखी लकड़ी का घनत्व हवा के समान होने के कारण कई बार CT स्कैन में उसकी पहचान करना बेहद कठिन हो जाता है। यही वजह रही कि तकनीकी जांच में भी यह खतरनाक लकड़ी का टुकड़ा पूरी तरह छूट गया।
बचा ली बच्चे की आंख
इसके बावजूद वरिष्ठ मैक्सिलोफेशियल सर्जन डॉ. रंगीला राम ने केवल रिपोर्ट पर भरोसा करने के बजाय अपनी क्लीनिकल जांच और अनुभव को प्राथमिकता दी। बच्चे की हालत और चोट के स्वरूप को देखते हुए उन्होंने आशंका जताई कि आंख के भीतर कोई बाहरी वस्तु जरूर फंसी हुई है। उनकी इस सतर्कता ने आगे चलकर बच्चे की आंख बचाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई।
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आंख का हुआ सफल ऑपरेशन
इसके बाद 28 अप्रैल को बच्चे को नेत्र विज्ञान विभाग में भर्ती किया गया। यहां शुरुआती जांच में पोस्ट-ट्रॉमेटिक प्रीसेप्टल सेल्युलाइटिस की स्थिति सामने आई। मामले की गंभीरता को देखते हुए नेत्र विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. राम लाल शर्मा ने तुरंत संयुक्त सर्जिकल हस्तक्षेप का निर्णय लिया। डाक्टरों ने पूरे मामले की गहराई से समीक्षा की और फिर ऑपरेशन की तैयारी शुरू की गई।
डॉक्टरों के सामने बड़ी चुनौती
करीब एक हफ्ते तक लगातार निगरानी और चिकित्सकीय तैयारी के बाद 6 मई को जनरल एनेस्थीसिया के तहत संयुक्त आपातकालीन सर्जरी की गई। इस चुनौतीपूर्ण ऑपरेशन में मैक्सिलोफेशियल और नेत्र विज्ञान विभाग की टीमों ने मिलकर काम किया। सर्जरी के दौरान डॉक्टरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती आंख की बेहद नाजुक आंतरिक संरचनाओं और ऑप्टिक नर्व को सुरक्षित रखना था, क्योंकि हल्की सी चूक बच्चे की दृष्टि हमेशा के लिए समाप्त कर सकती थी।
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आंख से निकला लकड़ी का टुकड़ा
लंबे और जटिल ऑपरेशन के बाद डाक्टरों ने अत्यंत सावधानी और कुशलता के साथ आंख के ऑर्बिट में फंसे लकड़ी के बड़े टुकड़े को सफलतापूर्वक बाहर निकाल लिया। ऑपरेशन के बाद बच्चे की आंख सुरक्षित पाई गई और उसकी रोशनी भी बच गई। अस्पताल प्रबंधन के अनुसार बच्चे की हालत अब पहले से काफी बेहतर है और वह चिकित्सकीय निगरानी में तेजी से स्वस्थ हो रहा है।
डॉक्टरों की हो रही सराहना
इस सफल ऑपरेशन ने न केवल IGMC के विशेषज्ञ डाक्टरों की दक्षता को साबित किया है- बल्कि यह भी दिखाया है कि कठिन परिस्थितियों में अनुभव, क्लीनिकल समझ और विभागों के बीच बेहतर समन्वय किस तरह किसी की जिंदगी और भविष्य दोनों बचा सकता है। अस्पताल में इस जटिल सर्जरी की चर्चा अब चिकित्सा जगत में भी हो रही है और डाक्टरों की टीम की सराहना की जा रही है।
