शिमला। हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले के रोहड़ू क्षेत्र के दलगांव में शनिवार को आयोजित भुंडा महायज्ञ के दौरान एक बड़ी घटना घटित हुई। यज्ञ स्थल पर बड़ी संख्या में लोग इस धार्मिक आयोजन को देखने के लिए पहुंचे हुए थे।

बेड़ा का रस्सा टूटा

जानकारी के अनुसार, बेड़ा की रस्म को पूरा किया जा ही रहा था कि उससे पहले रस्सा टूट गया। इस रस्म के दौरान रस्सी को पहाड़ी की ऊँची चोटी से एक खम्बे से बांधने का काम किया जा रहा था। रस्सी को दूसरी ओर सेट करने की प्रक्रिया में अचानक यह रस्सी बीच से टूट गई। यह घटना उस समय घटी जब लोग इसे दूसरे छोर पर पहुंचाने की कोशिश कर रहे थे। यह भी पढ़ें : हिमाचल में इस बार दस विषयों का होगा TET, शेड्यूल हुआ जारी

विचार विमर्श के बाद होगी अगली कार्रवाई

यह रस्सी यज्ञ के आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही थी और इसे ठीक तरह से सेट करना जरूरी था। इस घटना के बावजूद यज्ञ का आयोजन जारी है और विचार विमर्श कर आगे का कार्य किया जाएगा। गौरतलब है कि शनिवार को भुंडा महायज्ञ का तीसरा दिन था और इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं भक्त उपस्थित थे। यह भी पढ़ें : हिमाचल में मां की ममता हुई शर्मसार, कुहल में पड़ी मिली नवजात बच्ची

39 साल बाद होने जा रहा महायज्ञ

शिमला की स्पैल वैली में पूरे 39 साल बाद होने जा रहे भूंडा महायज्ञ में तीन स्थानीय देवता और तीन परशुराम शामिल होंगे। इस बार भूंडा महायज्ञ का आयोजन स्पैल वैली के देवता बकरालू मंदिर दलगांव में पूरे चार दिनों के लिए किया जा रहा है, जिसमें स्पैल वैली के साथ रामपुर क्षेत्र के लोग भी शामिल होंगे।

भूंडा महायज्ञ की विशेषता

स्पैल वैली के लोग इस आयोजन की प्लानिंग तीन साल से कर रहे हैं और अप्रैल माह से ही मुंजी यानी एक विशेष घांस को काटकर लंबी रस्सी बनाने में जुटे हैं। जिसे एक ऊंची पहाड़ी से नीचे की तरफ बांधा जाएगा और फिर रस्सी पर लगी काठ की घोड़ी पर सवार होकर एक शख्स फिसलते हुए दूसरी पहाड़ी तक जाएगा। यह भी पढ़ें : हिमाचल के वो देवता साहिब- जिनकी जिद्द के आगे झुक जाता है कानून

सूरत राम करेंगे पहाड़ी पार

इस अनुष्ठान में बेड़ा जाति से संबंध रखने वाले शख्स को घास से बनी रस्सी पर फिसलते हुए गहरी खाई को पार करना होता है। इस बार के भूंडा महायज्ञ में बेड़ा सूरत राम- 9 वीं बार घास से बनी रस्सी से फिसलकर इस रस्म को निभाएंगे।

क्या है मान्यता?

मान्यता है कि भूंडा महायज्ञ की शुरुआत भगवान परशुराम ने की थी। कहा जाता है कि इस महायज्ञ में परशुराम ने नरमुंडों की बलि दी थी। यही कारण है कि इसे नरमेघ यज्ञ भी कहा जाता है। भूंडा महायज्ञ करवाने का ये अनुष्ठान, पूर्ववर्ती बुशैहर रियासत के राजाओं की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। हिमाचल प्रदेश के कुल्लू के निरमंड, रामपुर बुशहर और रोहड़ू में इसे सदियों से मनाया जा रहा है।

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