मंडी। हिमाचल प्रदेश के जिला मंडी के धर्मपुर के बिंगा गांव में सदियों से उगाई जा रही कचालू की पारंपरिक किस्म अब देशभर में अपनी पहचान बनाएगी। गांव के खास ‘स्वाद कचालू’ को भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के तहत राष्ट्रीय स्तर पर पंजीकरण मिल गया है। इसकी खासियत है कि इसमें आम कचालू की तरह रेशा नहीं होता, जिसके चलते बाजार में इसकी काफी मांग है। अब पंजीकरण के बाद इस पारंपरिक फसल को बढ़ावा मिलने के साथ किसानों को भी इसका सीधा फायदा मिलने की उम्मीद है।
डेढ़ साल पहले शुरू हुई थी पंजीकरण की प्रक्रिया
FPO धर्मपुर के सचिव भूपेंद्र सिंह ने बताया कि बिंगा गांव में उगाया जाने वाला कचालू, जिसे अरबी भी कहा जाता है, यहां की बहुत पुरानी फसल है। इसकी हिमाचल के साथ-साथ दूसरे राज्यों में भी काफी मांग है। इसी को देखते हुए करीब डेढ़ साल पहले कृषि विज्ञान केंद्र सुंदरनगर के जरिए इसके पंजीकरण की प्रक्रिया शुरू की गई थी। अब इसका पंजीकरण ‘स्वाद कचालू’ के नाम से हो गया है।
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दूसरे इलाकों में भी उगाने की तैयारी
भूपेंद्र सिंह ने बताया कि आने वाले समय में एफपीओ की कोशिश रहेगी कि धर्मपुर उपमंडल के दूसरे इलाकों में भी इस कचालू की खेती शुरू की जाए। इससे इसका उत्पादन बढ़ेगा और इसे ज्यादा लोगों तक पहुंचाने के साथ-साथ इसकी बिक्री भी बढ़ाई जा सकेगी। इसका सीधा फायदा क्षेत्र के किसानों को मिलने की उम्मीद है।
बिंगा के कचालू में आखिर ऐसा क्या खास है?
कचालू को आमतौर पर बड़ी अरबी के नाम से भी जाना जाता है। मंडी और आसपास के जिलों में इसकी खेती और इस्तेमाल काफी ज्यादा होता है। खासकर शादी-ब्याह जैसे मौकों पर कचालू का दम बनाया जाता है, जिसे लोग काफी पसंद करते हैं।
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बिंगा के कचालू में नहीं होता रेशा
बिंगा गांव के किसान विद्या सागर ठाकुर ने बताया कि गांव में उगने वाले कचालू की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें रेशा नहीं होता। आमतौर पर बाजार में मिलने वाले कचालू में रेशा देखने को मिलता है, लेकिन बिंगा के कचालू में ऐसा नहीं है। इसी वजह से इसकी बाजार में काफी मांग है। अब राष्ट्रीय स्तर पर पंजीकरण होने के बाद इसकी पहचान और भी बढ़ गई है।
किसानों को मिलेगा रॉयल्टी का फायदा
कृषि विज्ञान केंद्र सुंदरनगर के वैज्ञानिक डॉ. पंकज सूद ने बताया कि केंद्र सरकार ने ऐसी खास फसलों और किस्मों को बचाने और बढ़ावा देने के लिए साल 2001 में पीपीवीएफआरए का गठन किया था।
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बिंगा के ‘स्वाद कचालू’ का पंजीकरण होने के बाद अब कोई भी व्यक्ति बिना अनुमति इसके बीज का इस्तेमाल नहीं कर सकेगा। अगर कोई किसान या संस्था इस किस्म की खेती करना चाहती है, तो उसे एफपीओ से अनुमति लेनी होगी या फिर तय रॉयल्टी देनी होगी। इसके बाद ही वह इसके बीज का इस्तेमाल कर सकेगा।
पारंपरिक फसल को मिलेगा बढ़ावा
इस पंजीकरण से बिंगा गांव की इस पारंपरिक फसल को सुरक्षित रखने और आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी। साथ ही किसानों को भी अपनी खास फसल की पहचान मिलने के साथ आर्थिक फायदा होने की उम्मीद है। सरकार का उद्देश्य भी ऐसी स्थानीय और पारंपरिक फसलों को संरक्षित करना और उन्हें आगे बढ़ावा देना है।
