शिमला। हिमाचल प्रदेश में आर्थिक सुधारों के लिए सख्त फैसले ले रही सुक्खू सरकार को एक बार फिर न्यायिक झटका लगा है। प्रदेश हाईकोर्ट ने उद्योगों पर बढ़ाए गए बिजली शुल्क की वसूली पर फिलहाल रोक लगाते हुए सरकार की नीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इससे पहले भी सरकार के राजस्व बढ़ाने से जुड़े फैसले अदालत में अटक चुके हैं, जिससे आर्थिक संतुलन की कोशिशों को लगातार चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
हाईकोर्ट ने बढ़ाए बिजली शुल्क पर लगाई रोक
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य के मध्यम और बड़े उद्योगों को राहत देते हुए सरकार द्वारा बढ़ाए गए बिजली शुल्क की वसूली पर अंतरिम रोक लगा दी है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल इन उपभोक्ताओं से 16.5 प्रतिशत से अधिक बिजली शुल्क नहीं लिया जा सकता। यह आदेश उद्योग जगत के लिए राहत भरा माना जा रहा है] जो लंबे समय से बढ़ी दरों का विरोध कर रहा था।
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सुक्खू सरकार को एक और झटका
राज्य की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली सरकार लगातार राजस्व बढ़ाने के उपाय कर रही है। लेकिन इन फैसलों को बार-बार कानूनी अड़चनों का सामना करना पड़ रहा है। इससे पहले बिजली परियोजनाओं से जल कर वसूलने के निर्णय पर भी हाईकोर्ट ने रोक लगा दी थी। अब बिजली शुल्क वृद्धि पर रोक लगना सरकार के लिए एक और बड़ा झटका माना जा रहा है।
शुल्क वृद्धि पर उठे कानूनी सवाल
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने माना कि बिजली शुल्क में की गई भारी बढ़ोतरी कानून के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है। अदालत के अनुसार यह वृद्धि हिमाचल प्रदेश बिजली (शुल्क) अधिनियम, 2009 की धारा 11(2) के खिलाफ प्रतीत होती है।
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कितनी थी वृद्धि और क्यों बनी विवाद की वजह
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि वर्ष 2017 में बिजली शुल्क 11 प्रतिशत निर्धारित था। इसके बाद सितंबर 2023 में इसे बढ़ाकर 25 प्रतिशत कर दिया गया और जनवरी 2024 में एक नई अधिसूचना जारी कर इसे 37.50 प्रतिशत तक पहुंचा दिया गया। उद्योगों का कहना है कि यह बढ़ोतरी अचानक और अत्यधिक है, जिससे उनकी लागत पर सीधा असर पड़ा।
कानून क्या कहता है
अदालत ने स्पष्ट किया कि अधिनियम की धारा 11(2) के तहत सरकार शुल्क दरों में संशोधन तो कर सकती है, लेकिन एक बार में वृद्धि पूर्व निर्धारित दर के 50 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती। इस आधार पर 11 प्रतिशत का अधिकतम बढ़ा हुआ शुल्क 16.5 प्रतिशत होना चाहिए था। ऐसे में 25 और 37.50 प्रतिशत तक की वृद्धि प्रथम दृष्टया नियमों के विपरीत मानी गई।
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सरकार को जवाब दाखिल करने के निर्देश
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और अन्य संबंधित पक्षों को चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। साथ ही मामले की अगली सुनवाई 23 अप्रैल को निर्धारित की गई है, जिसमें सभी लंबित याचिकाओं पर एक साथ विचार किया जाएगा। अब सभी की नजर 23 अप्रैल को होने वाली सुनवाई पर टिकी है। अदालत सरकार के पक्ष को किस हद तक स्वीकार करती है या उद्योगों को स्थायी राहत मिलती है। फिलहाल, इस अंतरिम आदेश ने प्रदेश की आर्थिक और औद्योगिक नीतियों पर नई बहस छेड़ दी है।
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आर्थिक सुधारों की राह में बढ़ती चुनौतियां
सुक्खू सरकार प्रदेश की आर्थिक स्थिति को पटरी पर लाने के लिए सख्त और साहसिक फैसले ले रही है, लेकिन इन फैसलों का कानूनी परीक्षण लगातार हो रहा है। बार-बार न्यायालयी रोक लगने से न केवल सरकार की नीतियों की गति प्रभावित हो रही है, बल्कि राजस्व जुटाने की रणनीति पर भी असर पड़ रहा है।
