शिमला। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सुक्खू सरकार का एक और फैसला पलट दिया है। कोर्ट ने आशा वर्करों को चुनाव लड़ने से रोकने संबंधी राज्य सरकार के स्पष्टीकरण पर अंतरिम रोक लगा दी है।
HC ने पलटा सुक्खू सरकार का फैसला
अदालत के इस फैसले के बाद प्रदेशभर की आशा कार्यकर्ताओं को बड़ी राहत मिली है। अब फिलहाल वे पंचायती राज संस्थाओं और शहरी निकाय चुनावों में भाग लेने से वंचित नहीं होंगी।
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आशा वर्कर भी लड़ सकती है चुनाव
यह आदेश न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने रीना देवी समेत अन्य याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर याचिका की प्रारंभिक सुनवाई के दौरान पारित किया। अदालत ने मामले में राज्य सरकार और राज्य चुनाव आयोग को नोटिस जारी करते हुए जवाब तलब किया है।
HC ने हटाई रोक
मामले की अगली सुनवाई पहली जून को निर्धारित की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि आशा वर्करों को सरकारी कर्मचारी मानना गलत है, क्योंकि वे नियमित सरकारी सेवा में नियुक्त नहीं हैं। ऐसे में उन्हें चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करना कानून और संविधान की भावना के खिलाफ है।
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अयोग्य घोषित किया गया था
याचिका में कहा गया कि 2 मई, 2026 को जारी संचार और स्पष्टीकरण के माध्यम से आशा कार्यकर्ताओं को निश्चित मासिक मानदेय और प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन पर कार्यरत अंशकालिक कर्मी बताया गया। इसी आधार पर उन्हें हिमाचल प्रदेश पंचायती राज अधिनियम 1994 की धारा 122(1)(g) के तहत पंचायत चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित किया गया था।
क्या कहा अदालत ने?
सुनवाई के दौरान अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि आशा वर्कर नियमित सरकारी कर्मचारी की श्रेणी में नहीं आतीं। इसलिए केवल मानदेय प्राप्त करने के आधार पर उन्हें चुनाव प्रक्रिया से बाहर नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि इस मामले में विस्तृत सुनवाई आवश्यक है, इसलिए फिलहाल सरकार के स्पष्टीकरण के अमल पर रोक लगाई जाती है।
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आशा कार्यकर्ताओं में खुशी का माहौल
हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद प्रदेशभर की आशा कार्यकर्ताओं में खुशी का माहौल है। कई आशा वर्करों का कहना है कि वे लंबे समय से ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी जिम्मेदारियां निभा रही हैं और अब उन्हें लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सा लेने का अवसर भी मिलना चाहिए। वहीं, राजनीतिक और सामाजिक हलकों में भी अदालत के इस निर्णय को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
