धर्मशाला। हिमाचल प्रदेश के मंत्री विक्रमादित्य सिंह के लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) को लेकर एक बड़ा मामला सामने आया है जहां अदालत ने विभाग की कार्यप्रणाली पर सख्त नाराजगी जताई है। कोर्ट ने विक्रमादित्य सिंह के अधीन आने वाले लोक निर्माण विभाग को ठेकेदार का भुगतान रोकने पर फटकार लगाई है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि विभाग किसी ठेकेदार से काम करवाने के बाद उसके भुगतान से इनकार नहीं कर सकता।

 

वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश डॉ. हकीकत ढांडा की अदालत ने लोक निर्माण विभाग को आदेश दिए हैं कि सरकारी ठेकेदार को उसकी बकाया राशि ब्याज सहित अदा की जाए। अदालत ने विभाग को 1,05,200 रुपये की राशि 6 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज के साथ चुकाने के निर्देश दिए हैं।

 

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44 लाख की सड़क परियोजना से जुड़ा है मामला

जानकारी के अनुसार यह मामला शाहपुर तहसील के एक सरकारी ठेकेदार से जुड़ा हुआ है। ठेकेदार को वर्ष 2012 में लगभग 44 लाख रुपये की लागत वाली सड़क निर्माण परियोजना का कार्य सौंपा गया था। निर्माण कार्य के दौरान वन विभाग और कुछ स्थानीय भूमि मालिकों की आपत्तियों के कारण सड़क का एक हिस्सा मूल योजना के अनुसार नहीं बन पाया।

इसके बाद लोक निर्माण विभाग ने ठेकेदार को वैकल्पिक स्थानों पर निर्माण कार्य करने के लिए चार अलग-अलग वर्क ऑर्डर जारी किए। ठेकेदार ने विभाग के निर्देशों के अनुसार अतिरिक्त कार्य भी पूरा कर दिया।

 

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काम पूरा होने के बाद रोक दिया भुगतान

ठेकेदार का आरोप था कि विभाग ने उससे अतिरिक्त कार्य तो करवा लिया, लेकिन उसका पूरा भुगतान नहीं किया। करीब दो लाख रुपये की राशि लंबे समय तक अटका कर रखी गई। भुगतान के लिए ठेकेदार लगातार विभाग के चक्कर काटता रहा, लेकिन उसे राहत नहीं मिली। आखिरकार परेशान होकर ठेकेदार ने अदालत की शरण ली। मामले की सुनवाई के दौरान यह सामने आया कि विभाग ने ठेकेदार के कार्य का लाभ उठाया, लेकिन भुगतान देने में लापरवाही बरती।

 

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कोर्ट ने कहा- भुगतान रोकना अनुचित

सुनवाई के बाद अदालत ने विभाग की दलीलों को पर्याप्त नहीं माना और सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि विभाग किसी व्यक्ति से कार्य करवाता है और उसका लाभ भी लेता है, तो वह भुगतान करने से पीछे नहीं हट सकता। अदालत ने अपने फैसले में साफ किया कि विभाग का यह दायित्व बनता है कि किए गए कार्य की उचित राशि का भुगतान समय पर किया जाए। इसी आधार पर न्यायालय ने ठेकेदार के पक्ष में फैसला सुनाते हुए ब्याज सहित भुगतान के आदेश जारी किए।

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