धर्मशाला। हिमाचल प्रदेश पिछले दो.तीन वर्षों में कुदरत के साथ हुई छेड़छाड़ का खामियाजा भीषण प्राकृतिक आपदाओं और तबाही के रूप में भुगत चुका है। मलबे में तब्दील होते घर और उफनते नालों के जख्म अभी भरे भी नहीं थे कि कांगड़ा जिले से पर्यावरण संरक्षण के दावों की धज्जियां उड़ाने वाला एक नया मामला सामने आया है। ताजा मामला कांगड़ा जिले के परौर क्षेत्र से सामने आया है, जिसने एक बार फिर पर्यावरण संरक्षण को लेकर चिंता बढ़ा दी है।

बिना अनुमति पहाड़ों की कटाई पर सवाल

परौर में राधा स्वामी सत्संग ब्यास के विस्तार कार्यों को लेकर गंभीर आरोप लगे हैं। हिमाचल प्रदेश राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ;छळज्द्ध को सौंपी गई ताजा रिपोर्ट ने शासन और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि निर्माण कार्यों के दौरान न तो पहाड़ों की कटाई के लिए वैधानिक अनुमति ली गई और न ही टाउन प्लानिंग विभाग से आवश्यक मंजूरी प्राप्त की गई। प्रशासन की नाक के नीचे बिना किसी तकनीकी मंजूरी के कंक्रीट का जाल बिछाया जा रहा हैए जिससे न केवल मिट्टी का कटाव बढ़ा है बल्कि क्षेत्र की भौगोलिक स्थिरता पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं।

 

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पेड़ों की कटाई पर लगाया मामूली जुर्माना

जांच रिपोर्ट में 35 देवदार और अन्य प्रजातियों के हरे.भरे पेड़ों को अवैध तरीके से काटने का संगीन मामला सामने आया है। हैरानी की बात यह है कि पर्यावरण को पहुंचाई गई इस अपूरणीय क्षति के बदले प्रशासन ने महज 5,000 रुपये का मामूली जुर्माना लगाकर औपचारिकता पूरी कर ली। पेड़ों की लकड़ी के बाजार मूल्य और उनके पारिस्थितिक महत्व के सामने यह जुर्माना ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। स्थानीय लोगों का मानना है कि इस तरह की ढिलाई बड़े संगठनों के हौसले बढ़ाती है और आम जनमानस में यह संदेश देती है कि कानून की बंदिशें सिर्फ कमज़ोरों के लिए हैं।

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मलबे के निस्तारण में लापरवाही, जलस्रोतों पर संकट

निर्माण के दौरान निकले मलबे को वैज्ञानिक तरीके से निपटाने के बजाय उसे आसपास के क्षेत्रों में फेंक दिया गया। इसका असर यह हुआ कि घनेटा, धोरन, बल्ला और दरांग जैसे गांवों के प्राकृतिक जलस्रोत प्रभावित हुए हैं। ताहल खड्ड और शी नाले में मलबा डाले जाने के कारण जल प्रवाह बाधित हो गया है, जिससे इन जलस्रोतों के सूखने का खतरा बढ़ गया है। आने वाले समय में यह स्थिति जल संकट का कारण बन सकती है।

मानसून में बढ़ सकता है खतरा

निरीक्षण के दौरान यह भी पाया गया कि नालों के किनारे बनाई गई सुरक्षा दीवारें तकनीकी दृष्टि से कमजोर हैं। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि मानसून के दौरान ये दीवारें मलबे के दबाव को झेल नहीं पाएंगी, जिससे बाढ़ या भूस्खलन जैसी आपदाएं उत्पन्न हो सकती हैं। यह स्थिति आसपास के गांवों के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।

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नोटिस के बावजूद जारी रहा निर्माण

प्रशासन द्वारा बार.बार नोटिस जारी किए जाने के बावजूद निर्माण कार्य जारी रहने की बात सामने आई है। इससे स्थानीय ग्रामीणों में असंतोष बढ़ गया है। लोगों का आरोप है कि उनकी आपत्तियों को नजरअंदाज किया गया और दबावपूर्ण तरीके से जमीनों का उपयोग किया गया। अब ग्रामीण इस पूरे मामले में सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।

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स्थानीय ग्रामीणों ने संगठन पर दबावपूर्ण तरीके से जमीनें कब्जाने के गंभीर आरोप लगाए हैं। इस विवाद ने पूरे इलाके में तनाव पैदा कर दिया है। अब जबकि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने जियो.टैग तस्वीरों के साथ बहाली की योजना मांगी हैए सबकी नजरें एनजीटी पर टिकी हैं कि क्या इस बार प्रकृति से खिलवाड़ करने वालों पर कोई कड़ी कार्रवाई होगी या फिर कागजी खानापूर्ति के बीच एक और आपदा का इंतजार किया जाएगा।