शिमला। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला की सियासत उस समय गरमा गई जब नगर निगम की नियमित बैठक राजनीतिक टकराव का मंच बन गई। आरोप-प्रत्यारोप, नारेबाजी और सत्ता–विपक्ष के आमने-सामने आने से सदन का माहौल काफी देर तक तनावपूर्ण बना रहा।

कैसे शुरू हुआ विवाद?

शिमला नगर निगम की मासिक आम बैठक शुक्रवार को आयोजित की गई थी। बैठक की कार्यवाही शुरू होते ही विपक्षी पार्षदों ने महापौर के कार्यकाल के विस्तार का मुद्दा उठा दिया।

महापौर सुरेंद्र चौहान सदन की अध्यक्षता कर रहे थे।

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9 BJP पार्षदों को किया निलंबित

इसी दौरान BJP पार्षदों ने यह कहते हुए आपत्ति जताई कि महापौर का कार्यकाल समाप्त हो चुका है और उन्हें बैठक संचालित करने का अधिकार नहीं है। जब विपक्षी पार्षदों ने लगातार व्यवधान डाला तो महापौर ने कार्यवाही में बाधा डालने के आरोप में भाजपा के नौ पार्षदों को निलंबित करने की घोषणा कर दी।

 

निलंबन के बाद तेज हुई नारेबाजी

इसके बाद स्थिति और अधिक तनावपूर्ण हो गई। सदन से बाहर जाने के निर्देश पर भाजपा पार्षदों ने नारेबाजी शुरू कर दी। उनका कहना था कि यदि महापौर का कार्यकाल वैध नहीं है, तो उन्हें निर्वाचित प्रतिनिधियों को निलंबित करने का अधिकार भी नहीं है। कई मिनट तक सदन में शोर-शराबा होता रहा, जिससे कार्यवाही बाधित हुई।

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महिला महापौर की मांग पर टकराव

BJP पार्षदों ने आरक्षण रोस्टर का हवाला देते हुए कहा कि अब महापौर पद महिला के लिए आरक्षित होना चाहिए। उनका दावा था कि जब तक नई महिला महापौर का चुनाव नहीं हो जाता, वे बैठक नहीं चलने देंगे।

कांग्रेस पार्षदों का आरोप

इस पर कांग्रेस पार्षदों ने पलटवार करते हुए भाजपा पर जानबूझकर निगम की कार्यवाही बाधित करने और विकास कार्यों में अड़ंगा डालने का आरोप लगाया। सत्ता पक्ष का कहना था कि विपक्ष राजनीतिक लाभ के लिए मुद्दे को तूल दे रहा है।

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सरकारी अधिसूचना पर सवाल

बैठक के बाद भाजपा पार्षदों ने मीडिया से बातचीत में कहा कि महापौर के कार्यकाल को बढ़ाने वाला अध्यादेश 6 जनवरी, 2026 को समाप्त हो चुका है। उनका आरोप था कि राज्य सरकार की ओर से इस संबंध में कोई नई अधिसूचना जारी नहीं की गई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका महापौर से व्यक्तिगत विरोध नहीं है, बल्कि वे नियमों और आरक्षण व्यवस्था के पालन की मांग कर रहे हैं। भाजपा ने कांग्रेस पर “महिला-विरोधी रुख” अपनाने का आरोप भी लगाया।

राजनीतिक माहौल हुआ गरम

घटना के बाद नगर निगम की राजनीति और अधिक गरमा गई है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा और तूल पकड़ सकता है, खासकर यदि आरक्षण रोस्टर और कानूनी स्थिति को लेकर स्पष्टता नहीं आई। फिलहाल, निगम की कार्यवाही बाधित होने से शहर के विकास कार्यों पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। दोनों दलों के बीच बढ़ती तल्खी से यह संकेत मिल रहे हैं कि आगामी बैठकों में भी माहौल तनावपूर्ण रह सकता है।

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