शिमला। हिमाचल प्रदेश के शहरों को आधुनिक सीवरेज और अपशिष्ट प्रबंधन सुविधाओं से लैस करने की महत्वाकांक्षी योजना अब सरकारी सुस्ती और प्रशासनिक देरी की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। स्वच्छ भारत मिशन (शहरी)-2.0 के तहत प्रदेश को 111.88 करोड़ रुपये की बड़ी राशि स्वीकृत हुई थी, लेकिन हैरानी की बात यह है कि मिशन की अवधि समाप्त होने में अब कुछ ही महीने बचे हैं और सरकार अब तक इस बजट का 10 प्रतिशत हिस्सा भी खर्च नहीं कर पाई है।
स्थिति इतनी चिंताजनक है कि करीब 112 करोड़ रुपये के स्वीकृत बजट में से अब तक केवल 8.93 करोड़ रुपये ही खर्च हुए हैं। यानी लगभग 92 प्रतिशत राशि अभी भी फाइलों और मंजूरियों के जाल में फंसी हुई है।
शहरों को स्वच्छ और हाईटेक बनाने का सपना अधूरा
स्वच्छ भारत मिशन (शहरी)-2.0 के तहत हिमाचल के विभिन्न शहरों में सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी), गंदे नालों की सफाई और आधुनिक अपशिष्ट प्रबंधन व्यवस्था विकसित करने की योजना बनाई गई थी। उद्देश्य था कि बढ़ते शहरीकरण के बीच शहरों को स्वच्छ, व्यवस्थित और पर्यावरण के अनुकूल बनाया जा सके। लेकिन पांच वर्ष के इस मिशन के अंतिम चरण में पहुंचने के बावजूद अधिकांश परियोजनाएं कागजों से आगे नहीं बढ़ पाई हैं।
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पांच साल में खर्च नहीं हो पाए 9 फीसदी पैसे
अक्तूबर 2021 में शुरू हुए इस मिशन के तहत हिमाचल प्रदेश में कुल 43 परियोजनाएं स्वीकृत की गई थीं। मिशन की अवधि अक्तूबर 2026 में समाप्त होनी है, लेकिन अब तक केवल 7.99 प्रतिशत बजट ही खर्च हो पाया है। यह आंकड़ा न केवल परियोजनाओं की धीमी गति को दर्शाता है, बल्कि सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े करता है। करोड़ों रुपये की योजनाएं स्वीकृत होने के बावजूद धरातल पर अपेक्षित प्रगति दिखाई नहीं दे रही।
29 परियोजनाएं अब भी फंड का इंतजार कर रहीं
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि 43 में से केवल 14 परियोजनाओं को ही वित्तीय स्वीकृति के बाद धनराशि जारी हो पाई है। बाकी 29 परियोजनाएं अभी भी वित्तीय प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार कर रही हैं। यानी जिन योजनाओं से शहरों की तस्वीर बदलने की उम्मीद थी, उनमें से अधिकांश अभी शुरुआती चरण से भी आगे नहीं बढ़ पाई हैं।
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तकनीकी मंजूरियों में उलझी कई योजनाएं
परियोजनाओं की धीमी रफ्तार का सबसे बड़ा कारण तकनीकी और प्रशासनिक मंजूरियों में हो रही देरी को माना जा रहा है। कुल 43 परियोजनाओं में से 22 अभी भी तकनीकी स्वीकृति की प्रक्रिया में हैं। कई महत्वपूर्ण शहरों और कस्बों की योजनाएं महीनों से फाइलों में अटकी हुई हैं। कुछ परियोजनाएं ऐसी हैं जहां अभी तक ठेकेदारों का चयन भी नहीं हो पाया है।
बड़े शहरों में शून्य प्रगति, छोटे कस्बों ने दिखाई रफ्तार
रिपोर्ट के अनुसार सबसे अधिक निराशाजनक स्थिति बड़े शहरों की परियोजनाओं की है। धर्मशाला और मंडी जैसे प्रमुख शहरों के लिए करोड़ों रुपये की परियोजनाएं स्वीकृत हैं और कार्य आवंटित भी हो चुका है, लेकिन खर्च का आंकड़ा अब भी शून्य बना हुआ है। इसके विपरीत पालमपुर, सुंदरनगर, रामपुर और सुन्नी जैसे छोटे शहरी निकायों ने उपलब्ध धनराशि का प्रभावी उपयोग कर बेहतर प्रगति दिखाई है। कुछ परियोजनाओं में तो लगभग पूरी राशि खर्च कर कार्य भी पूरा कर लिया गया है।
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अक्तूबर 2026 की डेडलाइन
मिशन की अवधि अक्तूबर 2026 में समाप्त होनी है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि यदि अब तक केवल 9 करोड़ रुपये ही खर्च हो पाए हैं, तो शेष 100 करोड़ रुपये से अधिक की राशि और दर्जनों परियोजनाएं तय समय सीमा के भीतर कैसे पूरी होंगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि परियोजनाओं की गति नहीं बढ़ी तो बड़ी राशि खर्च हुए बिना ही वापस जा सकती है और प्रदेश के कई शहर आधुनिक सुविधाओं से वंचित रह सकते हैं।
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सरकार के सामने बड़ी चुनौती
प्रदेश के शहरी क्षेत्रों में स्वच्छता और सीवरेज व्यवस्था को मजबूत करने के लिए शुरू की गई इस महत्वाकांक्षी योजना की धीमी प्रगति अब सरकार के लिए चुनौती बनती जा रही है। एक ओर शहरों में बेहतर सुविधाओं की मांग बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर स्वीकृत परियोजनाएं मंजूरियों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में उलझी हुई हैं। आने वाले महीनों में सरकार और संबंधित विभागों के लिए सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि वे वर्षों से लंबित परियोजनाओं को कितनी तेजी से धरातल पर उतार पाते हैं।
