ऊना। हिमाचल प्रदेश में बढ़ती महंगाई के बीच अब जनता को एक और बड़ा झटका लगने वाला है। हिमाचल प्रदेश में अब सपनों का घर बनाना और अधिक महंगा हो गया है। प्रदेश में लगातार बढ़ती महंगाई आम जनता को पूरी तरह से निचोड़ रही है। पेट्रोल डीजल रसोई गैस की कीमतों में बढ़ोतरी के बाद अब घर निर्माण की सबसे अहम चीज ईंटों के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। ईंटों के दाम बढ़ने से इसका असर उन लोगों पर पड़ेगा जो आने वाले समय में अपने सपनों का घर बनाने की सोच रहे हैं। 

 

निर्माण क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि कोयले की बढ़ती कीमतों और मौसम की मार ने ईंट उद्योग की कमर तोड़ दी है। इसका खामियाजा अब आम लोगों को भुगतना पड़ रहा है। हालात ऐसे बन गए हैं कि जो परिवार वर्षों से अपने सपनों का घर बनाने की योजना तैयार कर रहे थे] उन्हें अब अपना बजट दोबारा बनाना पड़ रहा है।

कोयले की आग में झुलसे घर बनाने के सपने

निर्माण सामग्री के बढ़ते दामों के बीच ईंटों की कीमतों में आई तेजी ने लोगों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। पिछले कुछ महीनों के दौरान ईंटों के दामों में भारी उछाल दर्ज किया गया है। जहां पहले एक हजार ईंटें 6500 से 7000 रुपये में मिल जाती थीं, वहीं अब इनके लिए 9000 से 9500 रुपये तक चुकाने पड़ रहे हैं।

 

विशेषज्ञों का मानना है कि ईंट उद्योग की रीढ़ माने जाने वाले कोयले की कीमतों में लगातार हो रही वृद्धि इसका सबसे बड़ा कारण है। कोयला महंगा होने से उत्पादन लागत तेजी से बढ़ी है और इसका सीधा असर बाजार में बिकने वाली ईंटों की कीमतों पर दिखाई दे रहा है।

 

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मानसून से पहले ही निर्माण कार्यों पर संकट

प्रदेश में इस बार मौसम का मिजाज लगातार बदलता रहा है। बेमौसमी बारिश और समय से पहले सक्रिय हुए वर्षा चक्र ने निर्माण गतिविधियों को प्रभावित किया है। ईंट भट्ठों में तैयार की जा रही बड़ी संख्या में कच्ची ईंटें बारिश की भेंट चढ़ गईं, जिससे उद्योग को भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा। भट्ठा संचालकों के अनुसार लाखों कच्ची ईंटों के खराब होने से उत्पादन प्रभावित हुआ है। इसके चलते बाजार में आपूर्ति पर भी असर पड़ा और मांग के मुकाबले उपलब्धता कम होने से कीमतों में तेजी देखने को मिली।

सीमेंट और सरिया पहले से महंगे, अब ईंटों ने बढ़ाई परेशानी

घर निर्माण से जुड़े लोगों का कहना है कि सीमेंट, सरिया और अन्य निर्माण सामग्री पहले ही महंगी चल रही है। ऐसे में ईंटों की कीमतों में आई नई बढ़ोतरी ने निर्माण लागत को और अधिक बढ़ा दिया है। एक सामान्य मकान के निर्माण में लाखों रुपये अतिरिक्त खर्च होने की संभावना बन गई है। इससे मध्यम वर्ग और सीमित आय वाले परिवारों पर सबसे अधिक असर पड़ रहा है। कई लोगों ने फिलहाल निर्माण कार्य टालने या छोटे स्तर पर करने का निर्णय लिया है।

 

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स्थानीय उत्पादन के बावजूद नहीं मिल रही राहत

हैरानी की बात यह है कि ऊना जिले सहित प्रदेश के कई क्षेत्रों में बड़ी संख्या में ईंट भट्ठे संचालित हो रहे हैं, इसके बावजूद उपभोक्ताओं को राहत नहीं मिल पा रही है। उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि उत्पादन लागत इतनी अधिक बढ़ चुकी है कि पुराने दामों पर ईंटें बेचना संभव नहीं रह गया है। डीजल, परिवहन खर्च और मजदूरी में बढ़ोतरी ने भी उद्योग पर अतिरिक्त बोझ डाला है, जिससे बाजार में कीमतें लगातार ऊपर जा रही हैं।

बेमौसमी बारिश ने बढ़ाया उद्योग का संकट

ईंट उद्योग से जुड़े कारोबारियों का कहना है कि पहले केवल मानसून के दौरान उत्पादन प्रभावित होता था, लेकिन अब मौसम की अनिश्चितता ने पूरे वर्ष कारोबार को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। अचानक होने वाली बारिश से तैयार हो रही ईंटें खराब हो जाती हैं और लाखों रुपये का नुकसान उठाना पड़ता है। कई भट्ठा संचालकों का दावा है कि इस सीजन में उन्हें भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा है, जिससे उद्योग की स्थिति लगातार चुनौतीपूर्ण होती जा रही है।

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राहत की उम्मीद कोयले की कीमतों से जुड़ी

उद्योग जगत का मानना है कि यदि आने वाले समय में कोयले और ईंधन की कीमतों में कमी आती है तो ईंटों के दामों में भी कुछ राहत मिल सकती है। फिलहाल बढ़ती उत्पादन लागत के कारण कीमतों में कमी की संभावना कम नजर आ रही है।

उद्योगपतियों का दर्द: "अब यह सिर्फ घाटे का सौदा है"

सलोह क्षेत्र के अनुभवी भट्ठा संचालक मूल राज बताते हैं कि अब इस काम में लाभ नाममात्र का भी नहीं बचा है। मजदूरों की भारी किल्लत, महंगा कोयला और जब-तब होने वाली बारिश ने इस कारोबार को पूरी तरह प्रभावित किया है। वह बताते हैं कि केवल अपने पिता की याद और विरासत को जिंदा रखने के लिए भट्ठा चला रहे हैं, वरना स्थितियां पूरी तरह विपरीत हैं।

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उधर, ईंट भट्ठा एसोसिएशन के प्रधान पोहू लाल भारद्वाज का कहना है कि ईंटों के दाम बढ़ाना उनकी मजबूरी है क्योंकि कोयला और तेल के बिना ईंट बनाना संभव नहीं है। पिछले एक साल में मौसम ने भारी नुकसान पहुंचाया है। हालांकि, उन्होंने एक उम्मीद जताते हुए कहा कि यदि आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कोयले की कीमतों में गिरावट आती है, तो स्थानीय स्तर पर भी ईंटों के दाम कम किए जा सकते हैं। तब तक जनता को इस महंगाई की भट्टी में तपना ही होगा।

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