करसोग (मंडी)। हिमाचल प्रदेश में पंचायत निकाय चुनाव संपन्न होने के बाद अब अध्यक्ष और उपाध्यक्ष की कुर्सियों पर कब्जा जमाने के लिए शह-मात का खेल चरम पर पहुंच चुका है। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दल अपने-अपने सदस्यों को ताज पहनाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। जोड़-तोड़ की इस सियासी जंग के बीच पूर्व मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर के गृह जिला मंडी में भाजपा के साथ एक ऐसा बड़ा खेला हो गया है जिसने राजनीतिक पंडितों को भी हैरत में डाल दिया है।
करसोग पंचायत समिति के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद के चुनाव में मंगलवार को भारी उलटफेर देखने को मिला। यहां पूर्ण बहुमत होने के बावजूद भाजपा अपना कुनबा बचाने में नाकाम रही और महज 4 सदस्यों वाली कांग्रेस ने अपनी अभेद्य रणनीतिक चाल से दोनों महत्वपूर्ण कुर्सियों पर कब्जा जमा लिया।
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बीजेपी के ही मोहरों से कांग्रेस ने दी शह और मात
इस चुनाव में कांग्रेस ने सीधी जंग लड़ने के बजाय भाजपा के ही अभेद्य किले में सेंधमारी करने की मास्टर रणनीति बनाई। कांग्रेस ने भाजपा खेमे के असंतुष्ट सुरों को भांपते हुए भाजपा समर्थित सदस्य इशरा मेहता को अध्यक्ष पद के लिए और कली चौहान को उपाध्यक्ष पद के लिए अपना समर्थन घोषित कर दिया।
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यह मुकाबला बेहद रोमांचक और कांटे का रहा। मतदान के बाद जब पर्चियां खुलीं, तो दोनों ही उम्मीदवारों ने महज एक-एक वोट के मामूली अंतर से ऐतिहासिक जीत दर्ज की। इस अप्रत्याशित नतीजे से जहां भाजपा खेमे में सन्नाटा पसर गया है, वहीं कांग्रेस खेमा इसे संगठन की बहुत बड़ी रणनीतिक जीत मानकर जश्न मना रहा है।
बहुमत भाजपा के पास, लेकिन कुर्सियां कांग्रेस के खाते में
करसोग पंचायत समिति के चुनाव परिणामों के बाद सदन का गणित पूरी तरह भाजपा के पक्ष में माना जा रहा था। 15 सदस्यीय पंचायत समिति में भाजपा समर्थित सदस्यों की संख्या कांग्रेस के मुकाबले कई गुना अधिक थी। भाजपा के पास 10 समर्थित सदस्य और एक निर्दलीय का समर्थन था। जबकि दूसरी तरफ कांग्रेस के पास केवल 4 निर्वाचित सदस्य थे।
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ऐसे में राजनीतिक जानकारों को उम्मीद थी कि दोनों प्रमुख पदों पर भाजपा का कब्जा लगभग तय है। लेकिन मतदान के दौरान हुए अप्रत्याशित घटनाक्रम ने सभी राजनीतिक आकलनों को गलत साबित कर दिया। ऐन वक्त पर क्रॉस वोटिंग और भितरघात ने भाजपा की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। बीजेपी अपने कुनबे को एकजुट रखने के लिए अंत तक जो रणनीति बना रही थी, वह ताश के पत्तों की तरह ढह गई।
चुराग के बाद करसोग का झटका
गौरतलब है कि करसोग से पहले विकास खंड चुराग की पंचायत समिति के चुनाव में भी इसी तरह का चौंकाने वाला राजनीतिक समीकरण देखने को मिला था। अब करसोग में हुए इस बड़े उलटफेर ने साबित कर दिया है कि पंचायत स्तर के चुनावों में केवल कागजी आंकड़ों या संख्या बल से जीत नहीं मिलती, बल्कि ऐन वक्त पर की गई राजनीतिक घेराबंदी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
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जयराम ठाकुर के गृह जिले में पूर्ण बहुमत के बावजूद इस हार से बीजेपी संगठन के भीतर के अंतर्विरोध और कमजोर तालमेल उजागर हो गए हैं। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा तेज है कि क्या स्थानीय नेतृत्व इस भीतरघात को पहले भांपने में नाकाम रहा या फिर कांग्रेस की फील्डिंग इतनी मजबूत थी कि बीजेपी को संभलने का मौका ही नहीं मिला।
