शिमला। हिमाचल प्रदेश में कर्मचारियों के अधिकारों को लेकर सुक्खू सरकार और माननीय उच्च न्यायालय के बीच एक बड़ा कानूनी टकराव खड़ा हो गया है। सुक्खू सरकार द्वारा दो दिन पहले ही कर्मचारियों के लिए जारी किए गए एक सख्त फरमान को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पूरी तरह गलत ठहराते हुए सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने अत्यंत तल्ख टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि यदि कोई कर्मचारी अपने तबादले के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाता हैए तो उसे डरानाए धमकाना या रोकना न्याय प्रशासन में बाधा डालने के समान है और ऐसा करना सीधे तौर पर अपराधिक अवमानना की श्रेणी में आता है।

अदालत ने की सख्त टिप्पणी

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायालय में याचिका दायर करना केवल एक कानूनी विकल्प नहीं बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार है। अदालत ने कहा कि देश में प्रत्येक व्यक्ति को न्याय प्राप्त करने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाने का अधिकार हासिल है और इस अधिकार को किसी भी प्रशासनिक आदेश या दबाव के माध्यम से सीमित नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि कानून के समक्ष समानता और जीवन व स्वतंत्रता से जुड़े संवैधानिक प्रावधान नागरिकों को न्यायिक संरक्षण प्राप्त करने का अधिकार प्रदान करते हैं।

 

यह भी पढ़ें : सुक्खू सरकार ने नेता की सिफारिश पर कर दिया कर्मचारी का तबादला, हाईकोर्ट ने किया रद्द; टिप्पणी भी की

सरकार के नए प्रावधान पर बढ़ी चर्चा

प्रदेश सरकार ने हाल ही में तबादलों से संबंधित शिकायतों के निपटारे के लिए नए दिशा-निर्देश लागू किए हैं। इन प्रावधानों के अनुसार यदि कोई कर्मचारी निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना सीधे अदालत पहुंचता है तो उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है। सरकार का तर्क है कि कर्मचारियों को पहले विभागीय स्तर पर उपलब्ध व्यवस्थाओं का उपयोग करना चाहिए। हालांकि हाईकोर्ट की ताजा टिप्पणियों के बाद इस प्रावधान को लेकर कानूनी और प्रशासनिक हलकों में व्यापक चर्चा शुरू हो गई है।

 

यह भी पढ़ें : हिमाचल: 150 फीट गहरी खाई में गिरा कार, युवती ने तोड़ा दम; चार घायल- सभी एक ही परिवार के सदस्य

न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप गलत

हाईकोर्ट ने अपने अवलोकन में स्पष्ट किया कि किसी कर्मचारी के अदालत जाने पर उसे दंडित करने या कार्रवाई की चेतावनी देना गंभीर मामला है। अदालत का मानना है कि यदि किसी व्यक्ति को न्यायिक मंच तक पहुंचने से हतोत्साहित किया जाता है तो यह न्याय प्रशासन की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। कानूनी विशेषज्ञों का भी मानना है कि न्यायालय तक पहुंच का अधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल भावना का हिस्सा है और इस पर किसी प्रकार की बाधा संवैधानिक बहस का विषय बन सकती है।

यह भी पढ़ें-हिमाचल : मारूति 800 से मिली लाखों की चरस, एक ही गांव के दो युवक गिरफ्तार

पहले भी अधिकारियों को मांगनी पड़ी थी माफी

ऐसे ही एक मामले में दो अधिकारियों को अदालत के समक्ष स्पष्टीकरण देना पड़ा था। मामला उस समय चर्चा में आया था जब एक कर्मचारी द्वारा अपने तबादले को अदालत में चुनौती दिए जाने के बाद उसे कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था। बाद में यह मामला न्यायालय के समक्ष पहुंचा और संबंधित अधिकारियों को अपनी कार्रवाई को लेकर सफाई देनी पड़ी। यह मामला अभी भी अंतिम निर्णय की प्रतीक्षा में है।

नोट : ऐसी ही तेज़, सटीक और ज़मीनी खबरों से जुड़े रहने के लिए इस लिंक पर क्लिक कर हमारे फेसबुक पेज को फॉलो करें