शिमला। हिमाचल प्रदेश में जेबीटी ट्रांसफर मामले को लेकर प्रदेश हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने साफ कहा कि शिक्षकों को मनचाहा जिला पाने का कोई अधिकार नहीं है। साथ ही सरकार को अंतर जिला तबादला नीति में बदलाव के बड़े सुझाव भी दिए गए हैं, जिनमें ट्रांसफर कोटा घटाने और न्यूनतम सेवा अवधि बढ़ाने की बात शामिल है। इस फैसले से ट्रांसफर प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है।
न्यूनतम सेवा अवधि को 5 से बढ़ाकर 15 वर्ष किया जाए
दरअसल, अदालत ने एक शिक्षक की याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को ट्रांसफर नीति में बदलाव पर विचार करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जिला कैडर के कर्मचारियों, विशेषकर जूनियर बेसिक टीचरों के लिए नियुक्ति के बाद बार-बार दूसरे जिलों में तबादले की मांग करना उचित नहीं है।
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अदालत ने सुझाव दिया कि अंतर जिला तबादला कोटे में कटौती की जाए और नियुक्ति वाले जिले में न्यूनतम सेवा अवधि को बढ़ाकर कम से कम 15 वर्ष किया जाए। वर्तमान में यह अवधि पांच वर्ष है, जिसके बाद कर्मचारी ट्रांसफर के लिए पात्र हो जाते हैं।
कर्मचारी शुरुआत में नियुक्ति से संतुष्ट रहते हैं
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने यह भी कहा कि कई मामलों में कर्मचारी शुरुआत में नियुक्ति से संतुष्ट रहते हैं, लेकिन कुछ समय बाद पारिवारिक या अन्य कारणों का हवाला देकर मनचाहे स्थान पर तबादले की मांग करने लगते हैं।
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जब प्रशासनिक स्तर पर यह संभव नहीं हो पाता, तो वे अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं। इस प्रवृत्ति पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा कि किसी भी कर्मचारी को दूसरे जिले में ट्रांसफर पाने का कोई मौलिक या निहित अधिकार नहीं है।
शिक्षा विभाग में स्थिरता आने की उम्मीद
यह मामला हाईकोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल की एकल पीठ के समक्ष आया, जिन्होंने सरकार की दलीलों से सहमति जताई। अदालत ने माना कि जिला कैडर में नियुक्त कर्मचारी उसी जिले में सेवा देने के लिए बाध्य होता है, और अंतर जिला तबादला पूरी तरह से प्रशासन के विवेकाधिकार पर निर्भर करता है।
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कोर्ट ने महाधिवक्ता को निर्देश दिए हैं कि वह इस संबंध में दिए गए सुझावों से राज्य सरकार को अवगत कराएं, ताकि नीति स्तर पर आवश्यक संशोधन किए जा सकें। इस फैसले के बाद भविष्य में अंतर जिला तबादलों को लेकर नियम और सख्त हो सकते हैं, जिससे शिक्षा विभाग में स्थिरता आने की उम्मीद जताई जा रही है।
