#विविध
May 20, 2026
हिमाचल में बढ़ता कुत्तों का आतंक : 3 साल में 3 लाख लोगों को काटा, 11 की मौ.त- सुप्रीम कोर्ट हुआ सख्त
शहरों से गांवों तक बढ़ा खतरा- डर के साए में लोग
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शिमला। हिमाचल प्रदेश में लावारिस कुत्तों का मुद्दा अब सिर्फ नगर निगमों की परेशानी नहीं, बल्कि लोगों की सुरक्षा से जुड़ा बड़ा संकट बन चुका है। राज्य अर्थ एवं सांख्यिकी विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, हिमाचल में करीब 1.80 लाख कुत्ते हैं- जिनमें लगभग 77 हजार लावारिस हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि असली संख्या इससे कहीं ज्यादा हो सकती है। दरअसल, बड़ी संख्या में लोग अपने पालतू कुत्तों का पंजीकरण नहीं करवाते। ऐसे में हिमाचल में कुल कितने कुत्ते हैं इसका सही आंकड़ा पता लगाना बहुत कठिन है।
पिछले तीन वर्षों में 31 अक्तूबर 2025 तक हिमाचल में 3,26,170 लोगों को कुत्तों ने काटा। यानी हर दिन सैकड़ों लोग डॉग बाइट का शिकार हुए। इन मामलों में 11 संदिग्ध रैबीज मौतें भी दर्ज की गईं। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े अब इस समस्या की गंभीरता को साफ दिखा रहे हैं।
शिमला, मंडी, धर्मशाला, सोलन और कुल्लू जैसे शहरों में लावारिस कुत्तों के झुंड लोगों के लिए डर का कारण बन चुके हैं। स्कूल जाते बच्चों, सुबह सैर पर निकलने वाले बुजुर्गों और बाइक सवार युवाओं पर हमले की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। कई इलाकों में लोग रात के समय अकेले निकलने से बचने लगे हैं।
सुप्रीम Court ने सोमवार को इस मामले में बेहद अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि रेबीज से संक्रमित, लाइलाज बीमारी से ग्रस्त या अत्यधिक आक्रामक कुत्तों को कानून के तहत मृत्यु दी जा सकती है। अदालत ने कहा कि लोगों को बिना डर के जीने और सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षित घूमने का अधिकार है।
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने साफ कहा कि जब इंसानों की सुरक्षा और कुत्तों के हित के बीच टकराव होगा, तो संविधान का पलड़ा हमेशा मानव जीवन की सुरक्षा की ओर झुकेगा। कोर्ट ने स्कूलों, अस्पतालों और रेलवे स्टेशनों जैसे सार्वजनिक स्थानों के आसपास से लावारिस कुत्तों को हटाने के निर्देश भी बरकरार रखे।
प्रदेश में लगातार बढ़ रही घटनाओं के बीच अब नसबंदी अभियान और डॉग शेल्टर व्यवस्था पर भी सवाल उठ रहे हैं। कई नगर निकायों में संसाधनों की कमी और धीमी कार्रवाई के कारण समस्या बढ़ती जा रही है। लोगों का कहना है कि शिकायतों के बावजूद कई इलाकों में कोई स्थायी समाधान नहीं हो पा रहा।
एक तरफ पशु अधिकारों की बात हो रही है, तो दूसरी तरफ आम लोग खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। ऐसे में हिमाचल में अब ऐसी नीति की मांग तेज हो गई है, जिसमें इंसानों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए लावारिस कुत्तों की बढ़ती संख्या पर प्रभावी नियंत्रण किया जा सके।