शिमला: हिमाचल प्रदेश को शिक्षा के क्षेत्र में देश के अग्रणी राज्यों में गिना जाता है, लेकिन सरकारी स्कूलों की जमीनी तस्वीर कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है। विधानसभा में बुधवार को सामने आए आंकड़ों ने प्रदेश की स्कूली शिक्षा व्यवस्था की उस चुनौती को उजागर कर दिया, जहां 150 सरकारी स्कूल बिना किसी शिक्षक के चल रहे हैं, जबकि करीब 3,500 स्कूलों में पढ़ाने की जिम्मेदारी महज एक शिक्षक के कंधों पर है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब स्कूलों में पढ़ाने वाला शिक्षक ही नहीं होगा, तो पहाड़ के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैसे मिलेगी? दूरदराज के इलाकों में शिक्षा की अलख कैसे जगेगी और सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले हजारों बच्चों का भविष्य कैसे संवरेगा?
कैसे पढ़ेंगे पहाड़ के बच्चेघ् कहीं शिक्षक नहीं , कहीं एक ही शिक्षक
विधानसभा के शून्यकाल में पच्छाद की भाजपा विधायक रीना कश्यप ने अपने विधानसभा क्षेत्र में शिक्षकों की भारी कमी का मुद्दा उठाया। उन्होंने सरकार का ध्यान उन स्कूलों की ओर खींचा, जहां पर्याप्त शिक्षक नहीं होने के कारण बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। उन्होंने बताया कि पच्छाद के कई स्कूलों में शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं।
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हालात इतने गंभीर हैं कि कई जगह अभिभावकों को खुद पैसे जुटाकर शिक्षकों की व्यवस्था करनी पड़ रही है। यह स्थिति सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। जिस शिक्षा की जिम्मेदारी सरकार की होनी चाहिए, वहां अगर अभिभावकों को ही शिक्षक रखने के लिए पैसा जुटाना पड़े, तो व्यवस्था की खामियों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
150 स्कूलों में एक भी शिक्षक नहीं
शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर ने विधानसभा में जवाब देते हुए बताया कि हिमाचल प्रदेश का छात्र-शिक्षक अनुपात 1:10 है। यानी औसतन हर 10 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक उपलब्ध है।
लेकिन औसत आंकड़े के पीछे पहाड़ी और दूरदराज क्षेत्रों की वास्तविक तस्वीर अलग नजर आती है। सरकार के मुताबिक प्रदेश में 150 स्कूल ऐसे हैं, जहां एक भी शिक्षक नहीं है। वहीं 3,500 स्कूल केवल एक शिक्षक के सहारे संचालित हो रहे हैं। इसके अलावा प्रदेश में करीब 2,500 स्कूल ऐसे हैं, जहां विद्यार्थियों की संख्या 15 से कम है।
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पच्छाद में 12 स्कूल शिक्षकविहीन
रीना कश्यप ने सदन में बताया कि उनके विधानसभा क्षेत्र पच्छाद के 12 स्कूलों में कोई शिक्षक नहीं है। इनमें कई स्कूल ऐसे हैं जहां 40 से ज्यादा विद्यार्थी पढ़ रहे हैं। नारग क्षेत्र के छह और सराहन क्षेत्र के पांच स्कूलों में शिक्षकों की कमी का मुद्दा भी उन्होंने प्रमुखता से उठाया। उन्होंने कहा कि कई स्कूलों में अभिभावक अपने स्तर पर धन एकत्र कर शिक्षकों की व्यवस्था करने के लिए मजबूर हैं। इसके अलावा प्राचार्यों और प्रवक्ताओं के पद भी खाली पड़े हैं। यह सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि ग्रामीण और पहाड़ी क्षेत्रों के बच्चों के लिए सरकारी स्कूल ही शिक्षा का सबसे बड़ा आधार हैं। यदि इन्हीं स्कूलों में शिक्षक उपलब्ध नहीं होंगे तो निजी स्कूलों का विकल्प हर परिवार के लिए संभव नहीं है।
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सरकार बोली- 6500 शिक्षकों की होगी भर्ती
शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर ने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि मौजूदा सरकार के कार्यकाल में अब तक करीब 9,000 शिक्षकों के पद भरे जा चुके हैं। उन्होंने दावा किया कि सरकार अपने कार्यकाल के अंत तक 6,500 और शिक्षकों की भर्ती करेगी। सरकार दूरदराज क्षेत्रों में शिक्षकों की कमी दूर करने के लिए युक्तिकरण प्रक्रिया का सहारा ले रही है। इसके जरिए जहां आवश्यकता ज्यादा है, वहां शिक्षकों की तैनाती करने की कोशिश की जा रही है। हालांकि मंत्री ने यह भी स्वीकार किया कि शिक्षकों की तैनाती में कई तरह के दबाव रहते हैं और कई बार नियुक्ति आदेशों में बदलाव भी करना पड़ता है।
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सीएम बोले- एकल शिक्षक वाले स्कूलों के लिए बनेगी नीति
मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने भी सदन में हस्तक्षेप किया। मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार एकल शिक्षक वाले स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्ति के लिए नीति तैयार कर रही है। सरकार का उद्देश्य ऐसे स्कूलों में शिक्षकों की कमी को दूर करना है, ताकि बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो। मुख्यमंत्री ने सिरमौर को केंद्र सरकार द्वारा आकांक्षी जिला घोषित किए जाने का जिक्र करते हुए कहा कि जिले के विद्यार्थी लिखित भर्ती परीक्षाओं के माध्यम से लगातार सफलता हासिल कर रहे हैं।
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गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए सिर्फ शिक्षक-छात्र अनुपात काफी नहीं
हिमाचल का 1:10 का छात्र-शिक्षक अनुपात सरकार के लिए उपलब्धि हो सकता है, लेकिन विधानसभा में सामने आए 150 और 3,500 स्कूलों के आंकड़े बताते हैं कि केवल राज्य का औसत अनुपात शिक्षा की पूरी तस्वीर नहीं बताता। एक स्कूल में 10 बच्चों पर एक शिक्षक का औसत तभी मायने रखता है, जब हर स्कूल में आवश्यक संख्या में शिक्षक मौजूद हों।
150 स्कूलों में शिक्षक शून्य और 3,500 स्कूलों में केवल एक शिक्षक—ये आंकड़े हिमाचल की शिक्षा व्यवस्था के सामने खड़ी असली चुनौती को बयां करते हैं। एक शिक्षक को कई कक्षाओं, अलग-अलग विषयों और प्रशासनिक जिम्मेदारियों को एक साथ संभालना पड़े तो बच्चों को व्यक्तिगत ध्यान देना मुश्किल हो जाता है। इसका सीधा असर पढ़ाई की गुणवत्ता पर पड़ सकता है।
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पहाड़ के बच्चों को भी चाहिए बराबर शिक्षा का अधिकार
हिमाचल का बड़ा हिस्सा पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्रों में बसा है। यहां कई गांवों में सरकारी स्कूल ही बच्चों की शिक्षा का एकमात्र विकल्प हैं। ऐसे में शिक्षक की कमी सिर्फ एक प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य से जुड़ा मुद्दा है। यदि सरकार वास्तव में 'हर बच्चे तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा' पहुंचाना चाहती है, तो उसे उन स्कूलों पर विशेष ध्यान देना होगा जहां शिक्षक नहीं हैं या केवल एक शिक्षक तैनात है।
