कांगड़ा। कहते हैं कि मेहनत और हौसले के आगे बड़ी से बड़ी मुश्किल भी छोटी पड़ जाती है। कांगड़ा के एक छोटे से गांव से निकलकर रक्षा राणा ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है। साधारण किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाली रक्षा ने अपनी मेहनत के दम पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिमाचल का नाम रोशन किया है। उनकी इस कामयाबी के पीछे संघर्ष, परिवार का साथ और सालों की कड़ी मेहनत की कहानी छिपी है।

किसान परिवार में जन्मीं, मुश्किलों से नहीं मानी हार

रक्षा राणा का जन्म 8 अगस्त 1996 को कांगड़ा के गांव कुआली में एक साधारण किसान परिवार में हुआ। जब वह महज आठ साल की थीं, तभी उनके पिता स्वर्गीय लक्ष्मी सिंह का निधन हो गया। परिवार में पांच भाई-बहन थे और पिता के जाने के बाद घर की पूरी जिम्मेदारी उनकी मां राजो देवी के कंधों पर आ गई।

 

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घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, लेकिन मां ने बच्चों की पढ़ाई और उनके सपनों में कभी कमी नहीं आने दी। परिवार ने मजदूरी और दूसरे छोटे-बड़े काम करके बच्चों की परवरिश और पढ़ाई जारी रखी।

रोज कई किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाती थीं रक्षा

रक्षा की पढ़ाई का सफर भी आसान नहीं रहा। स्कूल जाने के लिए उन्हें रोजाना कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था। इसके बाद ज्वालामुखी में कॉलेज की पढ़ाई और फिर पीजीडीसीए करने के लिए ऊना तक का सफर भी उन्होंने तय किया। मुश्किलें लगातार सामने आती रहीं, लेकिन रक्षा ने कभी पढ़ाई छोड़ने या अपने लक्ष्य से पीछे हटने का फैसला नहीं किया।

 

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कबड्डी का था शौक, ऐसे शुरू हुआ वेटलिफ्टिंग का सफर

रक्षा को बचपन से ही खेलों में काफी रुचि थी और वह कबड्डी खेलना पसंद करती थीं। हालांकि कॉलेज में पूरी टीम नहीं बन पाने के कारण वह कबड्डी में आगे नहीं बढ़ सकीं। इसके बाद 2016 में राजकीय डिग्री कॉलेज ज्वालामुखी के डीपी डॉ. पवन पटियाल ने उन्हें वेटलिफ्टिंग के लिए प्रेरित किया। रक्षा ने पहली ही इंटर कॉलेज प्रतियोगिता में रजत पदक जीतकर अपनी प्रतिभा दिखा दी।

 

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BSC की पढ़ाई पूरी करने के बाद पारिवारिक परिस्थितियों के कारण उन्हें कुछ समय के लिए खेल से दूर होना पड़ा। लेकिन करीब चार साल पहले उन्होंने दोबारा वेटलिफ्टिंग में वापसी की। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और लगातार मेहनत करती रहीं।

नौकरी के बाद रात तक करती हैं वेटलिफ्टिंग की प्रैक्टिस

आज रक्षा राणा मोहाली स्थित फिटनेस चेन प्रो अल्टिमेट जिम्स में काम करती हैं। दिनभर नौकरी करने के साथ वह पर्सनल ट्रेनिंग भी देती हैं। इसके बाद देर रात तक खुद वेटलिफ्टिंग की प्रैक्टिस करती हैं। पिछले चार साल से वह रोजाना कई घंटे कड़ी मेहनत कर रही हैं।

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रक्षा के प्रशिक्षक गुरकीरत सिंह और कमलदीप भी उनकी तैयारी में पूरा साथ देते हैं। नौकरी की वजह से रक्षा के लिए सुबह अभ्यास करना मुश्किल होता था, इसलिए उनके दोनों कोच रात करीब 11 बजे तक उन्हें ट्रेनिंग देने पहुंचते थे। उनकी इसी मेहनत का नतीजा पहले जून 2026 में धर्मशाला में राष्ट्रीय प्रतियोगिता का गोल्ड मेडल और अब नेपाल में अंतरराष्ट्रीय गोल्ड मेडल के रूप में सामने आया है।

मां ने अकेले संभाला परिवार, बेटी की कामयाबी पर है गर्व

रक्षा की मां राजो देवी ने कहा कि परिवार ने जिंदगी में कई मुश्किल दौर देखे हैं, लेकिन उन्होंने कभी बच्चों का हौसला टूटने नहीं दिया। पति के निधन के बाद आर्थिक परेशानियां जरूर आईं, लेकिन उन्होंने हमेशा अपने बच्चों को पढ़ाई करने और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।

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उन्होंने कहा कि रक्षा बचपन से ही बहुत मेहनती रही है। वह जो लक्ष्य तय करती है, उसे पूरा करने के लिए दिन-रात मेहनत करती है। बेटी की इस उपलब्धि पर पूरा परिवार गर्व महसूस कर रहा है। मां को उम्मीद है कि रक्षा आने वाले समय में देश के लिए और भी कई पदक जीतेगी।

अब ओलंपिक में भारत के लिए मेडल जीतना है सपना

नेपाल में गोल्ड मेडल जीतने के बाद रक्षा राणा ने अपनी सफलता का श्रेय अपनी मां राजो देवी, दिवंगत पिता, प्रशिक्षकों और पूरे परिवार को दिया। अब उनका सबसे बड़ा सपना ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करना और देश के लिए पदक जीतना है।

 

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रक्षा ने युवाओं से भी अपील की कि वे नशे से दूर रहें और खेलों को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं। उन्होंने कहा कि अपने सपनों को पूरा करने के लिए ईमानदारी और लगातार मेहनत जरूरी है। हालात कितने भी मुश्किल क्यों न हों, अगर इरादे मजबूत हों तो मेहनत के दम पर मंजिल हासिल की जा सकती है।