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September 16, 2026

व्हीलचेयर से विश्व मंच तक पहुंची हिमाचल की बेटी अंजलि, भारत को दिलाया स्वर्ण पदक; रचा इतिहास

अंजलि ठाकुर ने इस वर्ग में भारत को दिलाया पहला अंतरराष्ट्रीय स्वर्ण पदक

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Anjali Thakur Himachal Pradesh News

मंडी। हिमाचल की बेटी ने अपनी शारीरिक चुनौतियों को अपनी मंजिल के रास्ते की दीवार नहीं बनने दिया और अंतरराष्ट्रीय खेल मंच पर ऐसा इतिहास रच दिया, जिस पर पूरा देश गर्व कर रहा है। मंडी जिले के गोहर क्षेत्र के छोटे से गांव जनैणी की अंजलि ठाकुर ने चेक गणराज्य के पिलसेन में आयोजित पिलसेन-2026 वर्ल्ड बोशिया चैलेंजर में भारतीय टीम के साथ बीसी-3 पेयर स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीत लिया है। इस वर्ग में भारत का यह पहला अंतरराष्ट्रीय स्वर्ण पदक बताया जा रहा है।

मुश्किलों से लड़कर बनाया विश्व मंच पर नाम

अंजलि की यह जीत इसलिए भी खास है, क्योंकि उनकी जिंदगी आसान नहीं रही। एक कार दुर्घटना के बाद उनके शरीर का गर्दन के नीचे का हिस्सा प्रभावित हुआ, लेकिन उन्होंने परिस्थितियों के आगे हार मानने के बजाय खेल को अपनी नई पहचान बना लिया। जिस हादसे ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी, उसी के बाद अंजलि ने बोशिया को अपने सपनों का रास्ता बनाया। लगातार अभ्यास, धैर्य और मजबूत इरादों के दम पर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी जगह बनाई और अब भारत को ऐतिहासिक स्वर्ण पदक दिलाकर देश का नाम रोशन किया है।

 

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चेक गणराज्य में तिरंगे की शान बढ़ाई

पिलसेन में आयोजित अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में अंजलि भारतीय टीम का हिस्सा थीं। बीसी-3 पेयर स्पर्धा में उन्होंने प्रियंका, अजेया राज और संदीप के साथ मिलकर शानदार तालमेल दिखाया। कड़े मुकाबलों के बीच भारतीय खिलाड़ियों ने सटीक खेल, रणनीति और आपसी समन्वय का प्रदर्शन किया। आखिरकार टीम ने स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया। इस जीत के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बीसी-3 पेयर वर्ग में भारत को पहली बार गोल्ड मिलने की उपलब्धि दर्ज हुई।

जनैणी गांव से निकली बेटी ने बढ़ाया देश का मान

अंजलि ठाकुर मंडी जिले के गोहर उपमंडल की मौवीसेरी पंचायत के जनैणी गांव की रहने वाली हैं। अंतरराष्ट्रीय मंच पर उनकी जीत की खबर जैसे ही गांव पहुंची, परिवार और ग्रामीणों में खुशी की लहर दौड़ गई। एक छोटे से पहाड़ी गांव की बेटी के विश्व स्तर पर तिरंगे की शान बढ़ाने की खबर ने पूरे क्षेत्र को गौरवान्वित कर दिया है। परिवार के लिए यह सिर्फ पदक की खुशी नहीं, बल्कि अंजलि के वर्षों के संघर्ष और मेहनत की सबसे बड़ी सफलता है।

 

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माता-पिता की आंखों में छलकी खुशी

अंजलि की जीत की सूचना मिलने के बाद उनके पिता दमेश्वर दत्त और माता पार्वती देवी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। परिवार ने दूरभाष के माध्यम से बेटी को उसकी ऐतिहासिक जीत की बधाई दी। परिवार के अनुसार अंजलि ने कभी अपनी परिस्थितियों को अपने सपनों पर हावी नहीं होने दिया। कठिन दौर के बावजूद उन्होंने लगातार मेहनत जारी रखी और आखिरकार वह मुकाम हासिल किया जिसका सपना उन्होंने देखा था।

बोशिया बना अंजलि के लिए नई जिंदगी का रास्ता

अंजलि ने दुर्घटना के बाद बोशिया को अपने जीवन का हिस्सा बनाया। यह खेल विशेष रूप से गंभीर शारीरिक अक्षमता वाले खिलाड़ियों के लिए विकसित किया गया है और पैरालंपिक खेलों का हिस्सा है। बोशिया में खिलाड़ी लाल और नीली गेंदों को ‘जैक’ कही जाने वाली सफेद गेंद के ज्यादा से ज्यादा करीब पहुंचाने का प्रयास करते हैं। कई मुकाबलों में गेंदों की स्थिति का अंतर बेहद कम होता है और विजेता का फैसला बेहद सटीक माप के आधार पर होता है।

 

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देश के लिए गोल्ड जीतना था सपना

अंजलि ने बताया कि देश के लिए स्वर्ण पदक जीतना उनका सपना था और अब यह सपना पूरा हो गया है। उनकी इस उपलब्धि के बाद उनका अगला लक्ष्य आने वाली अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भी शानदार प्रदर्शन करना है। उन्होंने यह भी बताया कि अगले महीने जापान में प्रतियोगिता प्रस्तावित है और वह वहां भी जीत के सिलसिले को आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

अब घर लौटने का इंतजार

अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में भारत का नाम रोशन करने के बाद अंजलि के परिवार को अब उनके घर लौटने का बेसब्री से इंतजार है। परिवार के मुताबिक वह बुधवार को यूरोप से चंडीगढ़ पहुंचेंगी। जिस बेटी के लिए परिवार ने संघर्ष के हर दौर में हौसला बढ़ाया, अब उसी बेटी के ऐतिहासिक स्वर्ण पदक के साथ घर लौटने का इंतजार पूरा गांव कर रहा है।

 

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अंजलि की जीत ने दिया बड़ा संदेश

अंजलि ठाकुर की उपलब्धि मंडी के जनैणी गांव से निकलकर अंतरराष्ट्रीय खेल मंच तक पहुंची है। उनकी कहानी यह दिखाती है कि शारीरिक चुनौतियां सपनों की राह को कठिन जरूर बना सकती हैं, लेकिन मजबूत इच्छाशक्ति, निरंतर अभ्यास और परिवार के सहयोग से खिलाड़ी नई पहचान बना सकते हैं। हिमाचल की इस बेटी ने विकलांगता की बाधाओं को पीछे छोड़कर जो इतिहास रचा है, वह सिर्फ मंडी और हिमाचल की उपलब्धि नहीं, बल्कि भारतीय खेल जगत के लिए भी गर्व का क्षण है।

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