#विविध
January 28, 2026
हिमाचल में बर्फबारी के बीच भगाई गई बुरी शक्तियां- घरों से कई दिनों तक बंद रहेंगे लोग
40 दिन टूरिज्म बंद, एक दूसरे से बात नहीं करेंगे गांव वाले, ना ही बजेगा मोबाइल
शेयर करें:

लाहौल-स्पीति। देवभूमि हिमाचल के लोगों अपने देवी-देवातओं और संस्कृति के प्रति गहरी आस्था रखते हैं। हिमाचल का लाहौल-स्पीति जिला एक बार फिर अपनी अनोखी संस्कृति और अटूट देव आस्था का साक्षी बना।
जिला के तिनन और रांगलो गांव में बीती रात से पारंपरिक हालडा पर्व का शुभारंभ हो गया। हालांकि, बीते कई दिनों से लाहौल घाटी में लगातार भारी बर्फबारी हो रही है और कई क्षेत्रों में बर्फीला तूफान भी चल रहा है, लेकिन इसके बावजूद लोगों ने सदियों पुरानी परंपराओं को पूरे श्रद्धा भाव के साथ निभाया।
रात के समय तापमान माइनस डिग्री में पहुंच चुका था। चारों ओर बर्फ की मोटी परत जमी हुई थी, आसमान से बर्फ गिर रही थी और ठंडी हवाएं चल रही थीं। इसके बावजूद ग्रामीण बिना किसी छाते या मौसम की परवाह किए हाथों में जलती मशालें लेकर अपने-अपने इलाकों का भ्रमण करते नजर आए। मशालों की रोशनी और “हालडा हो” के जयघोष से पूरी घाटी गूंज उठी।
ग्रामीणों का मानना है कि मशालों के साथ किया जाने वाला यह भ्रमण बुरी शक्तियों को दूर भगाने और आने वाले नए वर्ष के लिए सुख-समृद्धि का आह्वान करता है। यही कारण है कि खराब मौसम के बावजूद लोग पूरे जोश और श्रद्धा के साथ इस परंपरा को निभाते हैं।
स्थानीय निवासी दिनेश कुमार और मंगल चंद ने बताया कि लाहौल-स्पीति जिला की चंद्रा घाटी के तिनन गांव में हालडा उत्सव को बौद्ध धर्म के नववर्ष के स्वागत के रूप में मनाया जाता है। इस पर्व का मुख्य आकर्षण सामूहिक रूप से देवदार की टहनियों से बनी मशालें जलाना होता है। रात के समय सभी ग्रामीण एक निर्धारित स्थान पर एकत्रित होते हैं और देवताओं से प्रार्थना करते हैं कि वे गांव और घाटी को बुरी शक्तियों से सुरक्षित रखें।
मंगल चंद ने बताया कि हालडा पर्व मुख्य रूप से धन और समृद्धि की देवी ‘शिश्कर आपा’ को समर्पित होता है। इस दौरान लोग आने वाले साल में अच्छी फसल, खुशहाली और सौभाग्य की कामना करते हैं।
हालडा पर्व की तिथियां बौद्ध पंचांग के अनुसार लामाओं द्वारा तय की जाती हैं। यही कारण है कि यह पर्व लाहौल घाटी के अलग-अलग क्षेत्रों-गाहर घाटी, चंद्रा घाटी और भागा घाटी में अलग-अलग समय पर मनाया जाता है। आने वाले दिनों में घाटी के अन्य गांवों में भी हालडा पर्व की रस्में निभाई जाएंगी।
ग्रामीणों ने बताया कि हालडा के बाद बुधवार को कुसिल पर्व मनाया जाएगा। इस दिन लोग घरों के भीतर ही परिवार के साथ रहते हैं और नौ प्रकार के पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद लेते हैं। इसके पीछे एक रोचक लोककथा जुड़ी हुई है।
मान्यता के अनुसार प्राचीन काल में मानव केवल देवी-देवताओं की पूजा करता था। इससे क्रोधित होकर असुर मानव बस्तियों को नुकसान पहुंचाने आते थे। तब तिनन खांगसर गांव के चार लोग अपने चेहरे पर मुखौटे लगाकर असुरों का वेश धारण करते, नृत्य करते और सांड को मारकर उसके मांस खाने का अभिनय करते थे। इस अभिनय और नृत्य के बीच असुर अपने उद्देश्य को भूल जाते और बिना किसी मानव को नुकसान पहुंचाए लौट जाते। तभी से यह परंपरा आज तक निभाई जा रही है।
स्थानीय विधायक अनुराधा राणा ने भी हालडा पर्व के अवसर पर घाटीवासियों को शुभकामनाएं दीं और कहा कि लाहौल-स्पीति की संस्कृति और परंपराएं इस क्षेत्र की पहचान हैं, जिन्हें हर पीढ़ी ने सहेज कर रखा है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह घाटी सिर्फ एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि आस्था और परंपराओं की जीवंत भूमि है, जहां कुछ समय के लिए प्रकृति और देवताओं को पूर्ण शांति देना जरूरी समझा जाता है। इन 40 दिनों के दौरान घाटी में आसुरी शक्तियों के सक्रिय होने की भी मान्यता है।
इन्हीं शक्तियों के नाश और क्षेत्र की रक्षा के लिए विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। 27 जनवरी से शुरू होने वाले हालडा उत्सव के बाद लगातार तीन दिनों तक हर घर में ‘बल राजा’ की स्थापना की जाती है। इसे सामूहिक आध्यात्मिक सुरक्षा कवच के रूप में देखा जाता है। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी लोग पूरे विश्वास के साथ इसका पालन करते हैं।
सिस्सू पंचायत के उप-प्रधान संदीप बताते हैं कि पहले सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण बाहरी लोगों का यहां पहुंचना लगभग असंभव होता था। ऐसे में देव परंपराओं का निर्वहन स्वाभाविक रूप से बिना किसी बाधा के हो जाता था। लेकिन बीते कुछ वर्षों में मौसम के मिजाज में बदलाव आया है। बर्फ कम गिर रही है और अटल टनल के बनने से लाहौल घाटी तक पहुंचना बेहद आसान हो गया है।
परिणामस्वरूप सर्दियों में भी बड़ी संख्या में पर्यटक यहां पहुंचने लगे हैं, जिससे घाटी की पारंपरिक शांति प्रभावित हो रही है। इसी को देखते हुए देव कमेटी ने हालडा उत्सव और तपस्या काल के दौरान टूरिज्म एक्टिविटी पर स्पष्ट बैन लगाने का निर्णय लिया।
देवता की तपस्या में किसी भी तरह की रुकावट न आए, इसके लिए स्थानीय लोग अपने व्यापारिक हितों को भी पीछे छोड़ देते हैं। कोकसर पंचायत में इस अवधि के दौरान लगभग सभी होटल, ढाबे, रेस्टोरेंट और होम-स्टे पूरी तरह बंद रहते हैं। लोग अपने प्रतिष्ठानों पर ताले लगा देते हैं और घाटी को शांत रखने में योगदान देते हैं।
वहीं सिस्सू में स्थिति थोड़ी अलग है। यहां हाईवे के किनारे कई व्यापारिक प्रतिष्ठान अब बाहरी लोगों द्वारा संचालित किए जा रहे हैं। ऐसे में सभी जगह पूर्ण बंद संभव नहीं हो पाता, लेकिन स्थानीय परिवार फिर भी अपने स्तर पर परंपरा का पालन करते हैं।
लाहौल–स्पीति ही नहीं, बल्कि कुल्लू घाटी के कई हिस्सों में भी देवी-देवताओं के स्वर्ग प्रवास की मान्यता प्रचलित है। सिस्सू और कोकसर में लगाया गया यह प्रतिबंध इस बात का उदाहरण है कि आधुनिक पर्यटन और प्राचीन आस्था के बीच संतुलन बनाना कितना जरूरी है।
स्थानीय लोग मानते हैं कि अगर परंपराएं सुरक्षित रहेंगी, तभी यह घाटी अपनी आत्मा को बचाए रख पाएगी। इसलिए हर साल की तरह इस बार भी 40 दिनों के लिए पर्यटन पर विराम लगाया गया है- ताकि देवता तपस्या कर सकें और घाटी में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहे।