कुल्लू। देवभूमि हिमाचल प्रदेश में आस्था और प्रकृति का अनोखा संगम देखने को मिलता है। यहां पहाड़ों की ऊंचाइयों पर बसे मंदिरों से लेकर पवित्र झीलों, झरनों और नदी-नालों के संगम तक हर साल लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। लेकिन पिछले कुछ समय से इन पवित्र स्थलों पर बढ़ती गंदगी और पर्यटकों की लापरवाही को लेकर अब देव समाज सख्त होता नजर आ रहा है।

 

इसी कड़ी में कुल्लू जिले की लगघाटी में करीब 12 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित प्रसिद्ध डायनासोर झील को लेकर इस बार बड़ा फैसला लिया गया है। हिमाचल में ‘20 भादो’ के दिन पवित्र जल स्रोतों में स्नान करने की सदियों पुरानी परंपरा के बीच इस बार डायनासोर झील में स्नान पर पूरी तरह रोक रहेगी। देवी-देवताओं की ओर से मिले आदेश के बाद लोगों से साफ तौर पर कहा गया है कि वे ‘20 भादो’ के दिन झील तक स्नान के लिए न पहुंचें और इसकी पवित्रता बनाए रखने में सहयोग करें।

देव आदेश के बाद झील में स्नान पर रोक

लगघाटी की आराध्य माता फुंगणी के कारदार रामलाल ठाकुर के अनुसार देवी-देवताओं ने गुर के माध्यम से आदेश दिया है कि इस बार ‘20 भादो’ के दिन डायनासोर झील में स्नान नहीं किया जाएगा। देव समाज ने श्रद्धालुओं से देव आज्ञा का पालन करने की अपील की है। इतना ही नहीं, लोगों से इस दिन झील के आसपास जाने से भी परहेज करने को कहा गया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब पिछले कुछ वर्षों में बड़ी संख्या में लोग इस पवित्र झील तक पहुंचने लगे हैं।

 

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गंदगी से नाराज देव समाज, अब सख्ती का संदेश

डायनासोर झील तक पहुंचने वाले रास्तों में कई देवी-देवताओं के धार्मिक स्थल आते हैं। इन रास्तों पर कुछ लोग रात में टेंट लगाकर रुकते हैं। देव समाज का आरोप है कि इस दौरान कई लोग शराब, बीड़ी-सिगरेट और अन्य निषेध वस्तुएं लेकर पहुंचते हैं। नशे के सेवन, तेज शोर-शराबे और जगह-जगह कचरा छोड़ने से धार्मिक स्थलों और झील के आसपास का वातावरण प्रभावित हो रहा है। इसी को लेकर देव समाज में नाराजगी है। अब देव समाज की ओर से स्पष्ट संदेश दिया गया है कि आस्था के नाम पर देवस्थलों को गंदा करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

 

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‘पवित्र झील है, पिकनिक स्पॉट नहीं’

देव समाज का कहना है कि डायनासोर झील केवल प्राकृतिक सुंदरता का केंद्र नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों की आस्था से जुड़ा अत्यंत पवित्र स्थल है। यहां देवी-देवताओं की मान्यताओं से जुड़ी परंपराएं सदियों से चली आ रही हैं। बीते वर्षों में यहां बढ़ती आवाजाही और कैंपिंग के कारण झील के आसपास कचरा फैलने की शिकायतें सामने आती रही हैं। ऐसे में इस बार ‘20 भादो’ के दिन स्नान पर रोक को झील की पवित्रता और पर्यावरण संरक्षण से जोड़कर देखा जा रहा है।

12 हजार फीट पर बसी रहस्यमयी झील

लगघाटी की ऊंची पहाड़ियों में स्थित डायनासोर झील अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के साथ धार्मिक और स्थानीय मान्यताओं के कारण भी विशेष महत्व रखती है। सर्दियों में यह झील बर्फ की सफेद चादर से ढक जाती है, जिससे इसका नजारा बेहद आकर्षक हो जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस झील का संबंध भगवान शिव से भी माना जाता है। देव समाज की मान्यता है कि इस पवित्र स्थल पर देवी-देवता स्नान करते हैं और श्रद्धालुओं का यहां पहुंचना भी देव आज्ञा से जुड़ा माना जाता है।

 

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‘20 भादो’ पर स्नान की सदियों पुरानी परंपरा

हिमाचल के पहाड़ी क्षेत्रों में ‘20 भादो’ का विशेष धार्मिक महत्व है। इस दिन झीलों, झरनों और नदी-नालों के संगम पर स्नान करने की परंपरा रही है। स्थानीय मान्यता है कि इस समय पहाड़ों में मौजूद औषधीय जड़ी-बूटियों का रस पानी में घुलता है। इसी कारण इन प्राकृतिक जलस्रोतों में स्नान को धार्मिक आस्था के साथ-साथ स्वास्थ्य से भी जोड़कर देखा जाता है।

कुल्लू के लिया संगम, मणिकर्ण, सरेउलसर, रुद्रनाग और खीरगंगा समेत कई स्थानों पर इस दिन श्रद्धालु पहुंचते हैं। लेकिन इस बार डायनासोर झील के मामले में परंपरा से अलग फैसला लिया गया है।

कई घाटियों के लोगों से भी अपील

देव समाज ने केवल लगघाटी के लोगों से ही नहीं, बल्कि मंडी, कांगड़ा, बड़ा भंगाल, छोटा भंगाल और चौहार घाटी के लोगों से भी ‘20 भादो’ के दिन डायनासोर झील में स्नान के लिए नहीं पहुंचने का आग्रह किया है। कारदार रामलाल ठाकुर ने लोगों से कहा है कि वे देव आज्ञा का सम्मान करें और झील के साथ-साथ रास्ते में आने वाले सभी धार्मिक स्थलों की स्वच्छता और पवित्रता बनाए रखने में सहयोग दें।

 

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आस्था के साथ प्रकृति बचाने का भी संदेश

डायनासोर झील को लेकर लिया गया यह फैसला सिर्फ धार्मिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देता है। ऊंचाई वाले संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्रों में प्लास्टिक, शराब की बोतलें, खाने-पीने का कचरा और कैंपिंग से निकलने वाला अपशिष्ट लंबे समय तक पर्यावरण को नुकसान पहुंचा सकता है। ऐसे में देव समाज की सख्ती ने यह सवाल भी खड़ा किया है कि क्या हमारी आस्था उन स्थानों की पवित्रता और प्रकृति को बचाने की जिम्मेदारी भी नहीं देती?

 

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देवभूमि के देवस्थलों को बचाने की जरूरत

हिमाचल को यूं ही देवभूमि नहीं कहा जाता। यहां पहाड़ों की चोटियों से लेकर घाटियों तक असंख्य मंदिर, झीलें, झरने और पवित्र स्थल लोगों की आस्था के केंद्र हैं। हर वर्ष देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु और पर्यटक इन स्थानों का रुख करते हैं। लेकिन बढ़ती आवाजाही के साथ यदि इन स्थलों पर कचरा और प्रदूषण बढ़ता गया तो आने वाली पीढ़ियों के लिए इनकी प्राकृतिक और धार्मिक विरासत को बचाना चुनौती बन सकता है।

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