शिमला। हिमाचल प्रदेश में एक ऐसी देवी माता हैं जिन्हें पूरी रियासत की रानी कहा जाता है। ये देवी मां तीन कोठियों की जाई हैं। देवी मां ने अपने देव भाइयों को बचाने के लिए चुहिया का रूप धारण कर लिया था। तभी से उनकी करूणा और शक्ति की मिसाल दी जाती है।
स्नेह से कहते हैं बुशहर की रानी
बुशहर क्षेत्र के खड़काग में विराजमान करुणामयी मंगलकारिणी माता लाटी जाहरी जी को स्नेह से बुशहर की रानी भी कहते हैं। कहा जाता है कि माता की उत्पत्ति सरियाबाग नामक स्थान पर हुई थी। यहां वे सबसे पहले चुहिया रूप में प्रकट हुईं और उनके साथ देव दत्तात्रेय जी, महारुद्र जी और विजय राणा जी चिड़िया के रूप में अवतरित हुए।
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भाइयों के लिए चुहिया बनीं मां
बताते हैं कि उस समय सरियाबाग में एक कूई का पेड़ और उसके नीचे एक तालाब था। एक दिन जब उनके भाई अचानक उस तालाब में डूबने लगे, तो माता ने तुरंत चुहिया का रूप धारण किया। अपने छोटे-से शरीर से तालाब में सुराख कर सारा पानी बाहर निकाल दिया और भाइयों की रक्षा की।
किसान को मूर्ति रूप में दर्शन
इसके बाद माता वहाँ से अदृश्य हो गईं और सराड़िसेरी (गड़ोड़ा) पहुँचीं। वहीं उन्होंने एक किसान को मूर्ति रूप में दर्शन दिए और उसे आदेश दिया कि खड़काग में उनका मंदिर बनाया जाए।
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रथ पर दिव्य शक्तियां विराजमान
वहीँ, माता लाटी जाहरी जी को बीमारियों और नकारात्मक शक्तियों के निवारण के लिए विशेष रूप से जाना जाता है और उनके रथ में मार्कंडेय ऋषि और वंशीरा जी जैसी दिव्य शक्तियां भी विराजमान हैं
राजा पदम ने ली माता की शरण
बताते हैं कि रियासत काल में राजा पदम सिंह के शासन में 10/100 खुंद में भयंकर महामारी फैली थी। ऐसे में जब सभी उपाय असफल हो गए, तब राजा ने माता की शरण ली गई। माता ने कहा कि गौरा में एक मेला आरंभ किया जाए, जहाँ वे स्वयं पधारेंगी। भक्तों ने वैसा ही किया।
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आशीर्वाद से समाप्त हुई महामारी
माता ने सभी पीड़ितों को आशीर्वाद दिया और महामारी समाप्त हो गई। तभी से ‘राज दरबार गौरा’ मेला आज भी बड़े श्रद्धा भाव से मनाया जाता है। आज भी माता लाटी जाहरी जी के मंदिर में दूर-दूर से श्रद्धालु अपनी पीड़ाओं और बाधाओं से मुक्ति पाने आते हैं।
