शिमला। हिमाचल देवी-देवताओं की भूमि है। यहां एक ऐसे देवता साहिब हैं जिनका मंदिर पानी पर है। जी, देव रखाऊ नाग जी का मंदिर पानी के ऊपर बना है। इनकी शक्ति ऐसी कि अगर कोई परखे, तो मुट्ठी से जल की धार बहा देते हैं। सूखे की मार हो या पानी की किल्लत – लोग दूर-दराज़ से इनके दरबार में जल मांगने आते हैं।
18 बाणों के साथ चलते हैं देव
नित्थर क्षेत्र के अधिष्ठाता और जल नाग कहे जाने वाले देव रखाऊ नाग जी 18 बाणों के साथ चलते हैं। कहा जाता है कि इनका वेग कुछ ऐसा है कि मां काली के बाण भी इन्हें पढ़ नहीं पाते।
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चुपचाप पीते थे गाय का दूध
नित्थर के धनाह गांव में इनकी मुख्य कोठी है, लेकिन इनकी उत्पत्ति हुई थी ऐढशी नामक स्थान पर, जहां इनका पहला मंदिर भी है। कहा जाता है पुराने समय में इस स्थान पर एक राणा रहा करता था। नाग देवता चुपचाप उसकी गाय का दूध पिया करते थे।
राणा वंश का किया समूल नाश
मगर जब दूध कम होने लगा, तो राणा ने ग्वाले और गाय दोनों पर अत्याचार किए। ये अन्याय देखकर देवता साहब रुष्ट हो गए और राणा के पूरे वंश का समूल नाश कर दिया।
सर्प के रूप में दिए थे दर्शन
इसके बाद वे ऐढशी से निकलकर बुवाई और फिर नाचणदड़ की ओर बढ़े, जहां भुवनेश्वरी माता दुरहा के मंदिर में उन्होंने सर्प रूप में दर्शन दिए। तभी से पजाई मेले के अंतिम दिन रखाऊ जाच की परंपरा है जिसमें देवता माता के रथ में विराजते हैं।
बूढ़ी नागिन मानती हैं पुत्र
आगे चलकर नाग देवता धनाह गांव पहुंचे, जहां धनेश्वरी माता काड़ी खैइ जी ने उन्हें अपने भाई के रूप में स्थान दिया। माता बूढ़ी नागिन जी उन्हें अपना पुत्र मानती हैं, और मां कुसुंबा भवानी के साथ वे खेगसु मंदिर में भी विराजते हैं।
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सूखा पड़ने पर जल की गुहार
देवता जी के मुख्य वज़ीर मशाण देवता हैं, और उनके साथ ब्रह्मवीर, कालियां, जोगणिया जैसी कई शक्तियां चलती हैं। इनसे जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा है। जब 50-60 साल पहले क्षेत्र में भीषण सूखा पड़ा था। बुढ़ा महादेव जी के परागण में रखाऊ नाग जी से जल की गुहार लगाई गई।
माने जाते हैं जल के संरक्षक
तब देवता ने अपनी मुट्ठी से जल निकालकर सबको चौंका दिया इसीलिए ये केवल देवता नहीं, जल के संरक्षक माने जाते हैं। हिमाचल की संस्कृति और आस्था का वो स्वरूप जो आज भी हर गांव-हर घाटी में जीवित है।
