कुल्लू। हिमाचल के कुल्लू जिले के एक देवता साहिब को बड़ा ठाकुर कहा जाता है क्योंकि इन्होंने सिर्फ एक पग रख कर अपना आधिपत्य चुन लिया था। यज्ञों के देव कहे जाने वाले इन देवता साहब को मां बूढ़ी नागिन से एक ऐसी कटारी मिली है जिसकी ताकत आंकना किसी के बस में नहीं। आज बात नारायण स्वरूप देवता साहब श्री सत्य नारायण जी की।

पहला कदम जहां, वहीं बसेंगे

कथा के अनुसार, पुराने समय में देवता जी अपने धर्मभाई देवता शुष्की वीर जी के साथ ‘शुष’ नामक स्थान पर रहते थे। शुष्की वीर जी ने उन्हें सदा वहीं रहने का आग्रह किया, पर सत्य नारायण जी ने शुष सहित कई अन्य स्थानों को नकारते हुए निर्धारित किया कि वे वहीं बसेंगे जहां उनका पहला कदम पड़ेगा।

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दिव्य शक्तियों से समूल नाश

उनका पहला कदम करशाला गांव के बीच पड़ा-जहां शिवलिंग की जलहरी ज़मीन के नीचे दबी थी। एक चरवाहे ने इसे खोज निकाला। जब गांव के ठाकुरों ने इसकी शक्ति परखने के लिए उस पर कुल्हाड़ी चलाई, तो उससे निकली दिव्य शक्तियों ने उनका समूल नाश कर दिया।

ताकतवर है देवता की कटारी

यहीं से सात नारायण अलग-अलग दिशाओं में प्रकट हुए, और करशाला में सत्य नारायण जी की पूजा प्रारंभ हुई। कहा जाता है, देवता जी की कटारी से कितनी भी दूर और कहीं भी हो रही घटना को देखा जा सकता है। 

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झील के भीतर जाकर परिक्रमा 

रघुपुर के राजा के सोने के ब्रागर खो जाने पर इसी कटारी में देखकर उन्हें खोजा गया था। यह दिव्य अस्त्र माता बूढ़ी नागिन का उपहार है। आज भी देवता सत्य नारायण जी, इस कटारी के बिना सरयोल्सर झील-माता बूढ़ी नागिन के स्थान-की यात्रा नहीं करते। वे उन दो देवताओं में से एक हैं, जो झील की परिक्रमा उसके भीतर जाकर करते हैं।