शिमला। हिंदू धर्म में हर त्योहार और व्रत को काफी महत्व दिया जाता है। हिंदू धर्म की महिलाएं कई वर्त रखती हैं और पूरी श्रद्धा और अराधना के साथ व्रत का पारण करती हैं। इन दिनों छठ पर्व की धूम मची हुई है। छठ का त्योहार देश-विदेश के लोग काफी धूमधाम से मनाते हैं।

कठोर होती है छठ पूजा

छठ पूजा के नियम और अनुशासन बहुत कठोर होते हैं। इसे शुद्धता, भक्ति, और संयम के साथ मनाया जाता है। व्रत करने वालों को विशेष नियमों का पालन करना होता है, जिससे इस पर्व की पवित्रता और महत्व बढ़ जाता है। छठ पूजा के दौरान व्रती 36 घंटे का निर्जला उपवास करते हैं। यह भी पढ़ें : हिमाचल : गहरी खाई में गिरी कार, 18 महीने का बच्चा और मां थे सवार

छठ पर्व का महत्व

छठ पूजा एक प्रमुख हिंदू पर्व है- जो सूर्य देव और छठी मैया की उपासना के लिए मनाया जाता है। ये व्रत सिर्फ महिलाओं द्वारा रखा जाता है। इस पर्व का प्रमुख उद्देश्य सूर्य देव को धन्यवाद देना और परिवार की सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य की कामना करना है। इस त्योहार के दौरान श्रद्धालु नदियों, तालाबों या घाटों पर जाकर सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करते हैं। छठ पर्व की रौनक ज्यादातर बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड में देखने को मिलती है।

कब मनाया जाता है छठ पर्व?

पंचांग के अनुसार, लोक आस्था का महापर्व छठ एक साल में दो बार मनाया जाता है। पहला चैत्र महीने में-जिसे चैती छठ कहा जाता है। दूसरा कार्तिक महीने में मनाया जाता है। कार्तिक में मनाए जाने वाला छठ पर्व कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि से शुरू हो जाता है। यह भी पढ़ें : हिमाचल : स्टोर रूम में पत्नी को देख पति के पैरों तले खिसकी जमीन, छोड़ चुकी थी दुनिया

कब मनाया जाएगा छठ पर्व?

आज से छठ पर्व शुरू हो गया है- जो कि चार दिन तक चलेगा। इन चारों दिन अलग-अलग तरह से पूजा पाठ किया जाता है। छठ का-
  • पहला दिन नहाय खाय
  • दूसरा दिन खरना
  • तीसरा संध्याकालीन अर्घ्य
  • अंतिम दिन प्रात:कालीन अर्घ्य होता है।
नहाय खाय- आज छठ पर्व का पहला दिन यानी नहाय खाय है। आज के दिन महिलाएं एक ही बार प्रसाद ग्रहण करेंगी। आज के दिन आम की लकड़ी की आग पर पंरपागत तरीके से खाने में चने की दाल, कद्दू और चावल बनाया जाता है। खरना- छठ पर्व का दूसरा दिन खरना 6 नवंबर को है। खरना वाले दिन महिलाएं रात में मीठा भात या खीर और गेंहू के आटे से पूड़ी तैयार करेंगी। खीर को भी शुक्कर या गुड़ से तैयार किया जाता है। रात में छठी मैया को प्रसाद का भोग लगाने के बाद देर रात या अगली सुबह सबको खरना का प्रसाद बांटा जाता है। यह भी पढ़ें : हिमाचल में भूकंप, तीन बार डोली धरती, क्या आपने महसूस किए झटके संध्याकालीन अर्घ्य- छठ पर्व का तीसरा दिन संध्याकालीन अर्ध्य 7 नवंबर को है। इस दिन किसी कृत्रिम जल स्रोत में छठ व्रती महिला स्नान कर पूजन सामग्री से सजे सूप के साथ खड़ी होती है। इसके बाद अस्त होते सूर्य देव को अर्घ्य दिया जाता है। इस दिन घाटों को केले के पेड़, फूल-पत्ती, रंगीन झालरों की मदद से सजाया जाता है। प्रातःकालीन अर्घ्य- छठ पर्व का चौथा व अंतिम दिन प्रात:कालीन अर्ध्य 8 नवंबर को है। इस दिन महापर्व छठ का समापन हो जाएगा। इस दिन सूर्य उदय होने से पहले व्रती महिलाएं और परिवार के अन्य सदस्य छठ का डाला लेकर नदी किनारे घाट पर पहुंच जाते हैं। सूर्य उदय होने से पहले व्रती महिलाएं या पूजन में हिस्सा लेने वाले सभी लोग घाट पर स्नान करते हैं। इसके बाद सूर्यदेव को प्रात:कालीन अर्घ्य देकर घर में परंपरागत पूजन करते हैं। यह भी पढ़ें : BIG BREAKING: गहरी खाई में गिरी बस, 50 यात्री थे सवार, मची चीख-पुकार

क्या होती है पूजा सामग्री?

व्रती महिला द्वारा बांस का सूप तैयार किया जाता है। जबकि, कुछ लोग तांबे या अन्य कीमती धातू का सूप का उपयोग करते हैं। पूजा सामग्री में नारियल, बड़ा वाला नींबू, केला,सेब, नारंगी, खीरा, गन्ना, ठेकुआ, गले की माला. चावल का लड्डू, बताशा, पान, सुपारी, मेवा और मिठाई शामिल है।

नदी किनारे रहते हैं व्रती

आपको बता दें कि छठ पर्व के दौरान कुछ लोग लगातार चार दिनों कर नदियों या तालाबों के किनारे रहकर सहपरिवार छठ पर्व मनाते हैं। ज्यादातर लोग गंगा किनारे व्रत मनाने को प्राथमिकता देते हैं। यह भी पढ़ें : हिमाचल में गन शॉप से कई बंदूकें चुरा ले गए शातिर, अलर्ट पर पुलिस

छठ पर्व से जुड़ी कथा

मान्यता है कि रामायण काल में जब भगवान राम और माता सीता अयोध्या लौटे थे, तब उन्होंने राज्याभिषेक के बाद सूर्य देव की पूजा की थी। वहीं, महाभारत में भी यह कथा आती है कि सूर्य पुत्र कर्ण सूर्य देव की उपासना करते थे और उनकी कृपा से ही उन्होंने महान योद्धा का दर्जा पाया।

छठ पूजा के नियम

छठ पूजा के नियम बहुत कठोर होते हैं। यहां छठ पूजा के कुछ मुख्य नियम बताए गए हैं-
  • व्रत करने वाले सफेद या हल्के रंग के वस्त्र पहनते हैं- जो सादगी और पवित्रता का प्रतीक होते हैं।
  • व्रती सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं- जिसमें प्याज, लहसुन और अन्य मसालों का उपयोग नहीं होता।
  • छठ पूजा के दौरान व्रती 36 घंटे का निर्जला उपवास करते हैं। यह उपवास खरना के दिन शाम से शुरू होकर चौथे दिन सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद समाप्त होता है।
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  • व्रती अपने मन और विचारों को शुद्ध और सकारात्मक बनाए रखते हैं।
  • छठ पूजा के सभी अनुष्ठान व्रती पूरे ध्यान, भक्ति और अनुशासन के साथ करते हैं।
  • छठ पूजा में सादगी का विशेष महत्व है। इस पर्व में किसी प्रकार के दिखावे और तामझाम से परहेज किया जाता है।
  • छठ पूजा के नियमों के अनुसार, डूबते हुए सूर्य और उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने का विशेष महत्व है।

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